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आज भी खरे हैं तालाब

एक बार फिर दुहरा लें कि मरुभूमि के सबसे विकट माने गए इस क्षेत्र में ९९.७८ प्रतिशत गांवों में पानी का प्रबंध है और अपने दम पर है। इसी के साथ उन सुविधाओं को देखें जिन्हें जुटाना नए समाज की नई संस्थाओं, मुख्यतः सरकार की ज़िम्मेदारी मानी जाती है: पक्की सड़कों से अभी तक केवल १९ प्रतिशत गांव जुड़ पाए हैं, डाक आदि की सुविधा ३० प्रतिशत तक फैल पाई है। चिकित्सा आदि की देखरेख ९ प्रतिशत तक पहुंच सकी है। शिक्षा सुविधा इन सबकी तुलना में थोड़ी बेहतर है-५० प्रतिशत गांवों में। फिर से पानी पर आएं- ५१५ गांवों में ६७५ कुएं और तालाब हैं। इसमें तालाबों की संख्या २९४ है।

जिसे नए लोगों ने निराशा का क्षेत्र माना वहां सीमा के छोर पर, पाकिस्तान से थोड़ा पहले आसूताल यानी आस का ताल है। जहां तापमान ५० अंश छू लेता है वहां सितलाई यानी शीतल तलाई है और जहां बादल सबसे ज्यादा 'धोखा' देते हैं वहां बदरासर भी है। लेकिन ऐसी बात नहीं है कि मरुभूमि में पानी का कष्ट नहीं रहा है। लेकिन यहां समाज ने उस कष्ट का रोना नहीं रोया। उसने इस कष्ट को कुछ सरल बना लेने की आस रखी और उस आस के आधार पर अपने को इस तरह के संगठन में ढाल लिया कि एक तरफ पानी की हर बूंद का संग्रह किया और दूसरी तरफ उसका उपयोग खूब किफायत और समझदारी से किया।

संग्रह और किफायत के इस स्वभाव को न समझ पाने वाले गजेटियर और जिनका वे प्रतिनिधित्व करते हैं, उस राज और समाज को यह क्षेत्र 'वीरान, वीभत्स, स्फूर्तिहीन और जीवनहीन' दिखता है। लेकिन गजेटियर में यह सब लिख जाने वाला भी जब घड़सीसर पहुंचा है तो 'वह भूल जाता है कि वह मरुभूमि की यात्रा पर है।'

कागज़ में, पर्यटन के नक्शों में जितना बड़ा शहर जैसलमेर है, लगभग उतना ही बड़ा तालाब घड़सीसर है। कागज़ की तरह मरुभूमि में भी ये एक दूसरे से सटे खड़े हैं–बिना घड़सीसर के जैसलमेर नहीं होता। लगभग ८०० बरस पुराने इस शहर के कोई ७०० बरस, उसका एक-एक दिन घड़सीसर की एक-एक बूंद से जुड़ा रहा है।

रेत का एक विशाल टीला सामने खड़ा है। पास पहुंचने पर भी समझ नहीं आएगा कि यह टीला नहीं, घड़सीसर की ऊंची-पूरी, लंबी-चौड़ी पाल है। जरा और आगे बढ़े तो दो बुर्ज और पत्थर पर सुन्दर नक्काशी के पांच झरोखों और दो छोटी और एक बड़ी पोल का प्रवेश द्वार सिर उठाए खड़ा