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आज भी खरे हैं तालाब

निहारते रहते हैं तो कुछ गीत गाते और रावण हत्था, एक तरह की सारंगी बजाते हुए मिलते हैं।

पनिहारिनें आज भी घाटों पर आती हैं। पानी ऊंटगाड़ियों से भी जाता है और दिन में कई बार ऐसी टैंकर गाड़ियां भी यहां देखने मिल जाती हैं, जिनमें घड़सीसर से पानी भरने के लिए डीज़ल पंप तक लगा रहता है। घड़सीसर आज भी पानी दे रहा है। और इसीलिए सूरज आज भी उगते और डूबते समय घड़सीसर में मन-भर सोना उंडेल जाता है।

घड़सीसर मानक बन चुका था। उसके बाद किसी और तालाब को बनाना बहुत कठिन रहा होगा। पर जैसलमेर में हर सौ–पचास बरस के अंतर पर तालाब बनते रहे-एक से एक, मानक के साथ मोती की तरह गुंथे हुए।

घड़सीसर से कोई १७५ बरस बाद बना था जैतसर। यह था तो बंधनुमा तालाब ही पर अपने बड़े बगीचे के कारण बाद में बस इसे 'बड़ा बाग' की तरह ही याद रखा गया। इस पत्थर के बांध ने जैसलमेर के उत्तर की तरफ खड़ी पहाड़ियों से आने वाला सारा पानी रोक लिया है। एक तरफ जैतसर है और दूसरी तरफ उसी पानी से सिंचित बड़ा बाग। दोनों का विभाजन करती है बांध की दीवार। लेकिन यह दीवार नहीं, अच्छी-खासी चौड़ी सड़क लगती है जो घाटी पार कर सामने की पहाड़ी तक जाती है। दीवार के नीचे बनी सिंचाई नाली का नाम है राम नाल।

फिर भी ६६८ बरस पुराना घड़सीसर मरा नहीं है।
बनाने वालों ने उसे समय के थपेड़े सह जाने लायक
मजबूती दी थी। रेत की आंधियों के बीच
अपने तालाबों की उम्दा सार-सम्भाल की परंपरा
डालने वालों को शायद उसका
अन्दाज नहीं था कि कभी उपेक्षा की आंधी भी चलेगी।

राम नाल नहर, बांध की तरफ सीढ़ीनुमा है। जैतसर में पानी का स्तर ज़्यादा हो या कम, नहर का सीढ़ीनुमा ढांचा पानी को बड़े बाग की तरफ उतारता रहता है। बड़ा बाग में पहुंचने पर राम नाल राम नाम की तरह कण-कण में बंट जाती है। नहर के पहले छोर पर एक कुआं भी है। पानी सूख जाए, नहर बंद हो जाए तो रिसन से भरे कुएं का उपयोग होने लगता है। उधर बांध के उस पार आगर का पानी सूखते ही उसमें गेहूं बो दिया जाता है। तब बांध की दीवार के दोनों ओर बस हरा ही हरा दिखता है।