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आज भी खरे हैं तालाब

जानकारियां ज़रूर एकत्र कीं, लेकिन यह सारा अभ्यास कुतूहल से ज़्यादा नहीं था। उसमें कर्तव्य के सागर और उसकी बूंदों को समझने की दृष्टि नहीं थी। इसलिए विपुल मात्रा में जानकारियां एकत्र करने के बाद भी जो नीतियां बनीं, उन्होंनें तो इस सागर और बूंद को अलग-अलग ही किया।

उत्कर्ष का दौरा भले ही बीत गया था, पर अंग्रेज़ों के बाद भी पतन का दौर प्रारंभ नहीं हुआ था। उन्नीसवीं सदी के अंत और तो और बीसवीं सदी के प्रारंभ तक अंग्रेज़ यहां घूमते-फिरते जो कुछ देख रहे थे, लिख रहे थे, जो गजेटियर बना रहे थे, उनमें कई जगहों पर छोटे ही नहीं, बड़े-बड़े तालाबों पर चल रहे काम का उल्लेख मिलता है।

मध्य प्रदेश के दुर्ग और राजनांदगांव जैसे क्षेत्रों में सन् १९०७ तक भी "बहुत से बड़े तालाब बन रहे थे।" इनमें तांदुला नामक तालाब "ग्यारह वर्ष तक लगातार चले काम के बाद बन कर बस अभी तैयार ही हुआ था। इससे सिंचाई के लिए निकली नहरों-नालियों की लंबाई ५१३ मील थी।"

जो नायक समाज को टिकाए रखने के लिए यह सब काम करते थे, उनमें से कुछ के मन में समाज को डिगाने-हिलाने वाली नई व्यवस्था भला कैसे समा पाती? उनकी तरफ से अंग्रेज़ों को चुनौतियां भी मिलीं। सांसी, भील जैसी स्वाभिमानी जातियों को इसी टकराव के कारण अंग्रेज़ी राज ने ठग और अपराधी तक कहा। अब जब सब कुछ अंग्रेज़ों को ही करना था तो उनसे पहले के पूरे ढांचे को टूटना ही था। उस ढांचे को दुतकारना, उसकी उपेक्षा करना कोई बहुत सोचा-विचारा गया कुटिल षड्यंत्र नहीं था। वह तो इस नई दृष्टि का सहज परिणाम था और दुर्भाग्य से यह नई दृष्टि हमारे समाज के उन लोगों तक को भा गई थी, जो पूरे मन से अंग्रेजों का विरोध कर रहे थे और देश को आज़ाद करने के लिए लड़ रहे थे।

पिछले दौर के अभ्यस्त हाथ अब अकुशल कारीगरों में बदल दिए गए थे। ऐसे बहुत से लोग जो गुनीजनखाना यानी गुणी माने गए जनों की सूची में थे, वे अब अनपढ़, असभ्य, अप्रशिक्षित माने जाने लगे। उस नए राज और उसके प्रकाश के कारण चमकी नई सामाजिक संस्थाएं नए आंदोलन भी अपने ही नायकों के शिक्षण-प्रशिक्षण में अंग्रेज़ों से भी आगे बढ़ गए थे। आज़ादी के बाद की सरकारों, सामाजिक संस्थाओं तथा ज़्यादातर आंदोलनों में भी यही लज्जाजनक प्रवृत्ति जारी रही है।

उस गुणी समाज के हाथ से पानी का प्रबंध किस तरह छीना गया इसकी एक झलक तब के मैसूर राज में देखने मिलती है।