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आज भी खरे हैं तालाब

प्रसंग का विवरण इस पुस्तक में मिल सकता है। लेखक हैं श्री के. वी. मित्तल, ७९/२, सिविल लाइन्स, रुड़की, उत्तर प्रदेश। इस पुस्तक से हमारा परिचय डॉ. जी. डी. अग्रवाल के साथ हुई चर्चाओं से हुआ था। वे आई.आई.टी. कानपुर में प्राध्यापक रहे हैं और इस विषय की आधुनिकतम पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ गजधरों की परंपरा का भी सम्मान करते हैं। उनका पता है: प्रमोद वन, चित्रकूटधाम कर्वी, जिला बांदा, उत्तरप्रदेश। वापस फिर श्री धर्मपाल पर लौटें।

इस विषय पर पुणे की संस्था इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्चरल फ्रीडम में श्री धर्मपाल के भाषण हुए थे। इन भाषणों को नई दिल्ली के दैनिक हिंदी पत्र 'जनसत्ता' ने एक लेखमाला के रूप में प्रकाशित किया था जो बाद में शताब्दी प्रकाशन, ४८ स्वर्णकार कालोनी, विदिशा, मध्य प्रदेश की ओर से 'अंग्रेजों से पहले का भारत' शीर्षक से एक पस्तक के रूप में प्रकाशित हुए थे। गांधी शांति प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित श्री रामेश्वर मिश्र पंकज की पुस्तक 'आज की अपेक्षाएं' और 'नदियां और हम' भी इस विस्तृत लेकिन लगभग विस्मृत विषय पर उम्दा प्रकाश डालती हैं।

रीवा के तालाबों की जानकारी सन् १९०७ के गजेटियर से ली गई है। गजेटियर तब की रीवा रियासत में आने वाले गांवों के तालाबों का विस्तृत ब्यौरा देता है।

थार के रेगिस्तान में पानी के काम पर श्री ओम थानवी, संपादक, जनसत्ता, नई दिल्ली; श्री शुभू पटवा, भीनासर, बीकानेर तथा श्री सुरेन्द्रमल मोहनोत, मरुभूमि विज्ञान केंद्र, १०९ नेहरू पार्क, जोधपुर से संपर्क किया जा सकता है।

दिल्ली के ३५० तालाबों का उल्लेख सन् १९७१ की जनगणना रिपोर्ट में मछली पालन के संदर्भ में मिलने वाले पुराने आंकड़ों में सिर्फ एक पंक्ति में मिलता है। इस छोर को पकड़ कर आगे काम करते हुए हमें भारतीय मानचित्र सर्वेक्षण विभाग द्वारा सन् १८०७ की दिल्ली पर हाल में ही छपे एक नक्शे में कई तालाब देखने मिलते हैं।

इसी सिलसिले में श्री मुहम्मद शाहिद के सौजन्य से मिले दिल्ली के सन् १९३० के एक दुर्लभ नक्शे में उस समय के शहर में तालाबों और कुओं की गिनती लगभग ३५० की संख्या छूती है। शाहिदजी से २५८३, चूड़ीवालान, दिल्ली-६ पर संपर्क किया जा सकता है।