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आज भी खरे हैं तालाब

 ने। इसी विषय पर श्री कलानंद मणि का एक लेख गांधी शांति प्रतिष्ठान के मासिक पत्र गांधी मार्ग में सन् ९३ के फरवरी अंक में प्रकाशित हुआ है।

तमिलनाडु की समृद्ध एरी परंपरा पर मद्रास की संस्था 'पैट्रियाटिक एंड पीपल्स ओरियंटेड साइंस एंड टेक्नालॉजी ग्रुप' ने काफी काम किया है। श्री टी.एम. मुकुंदन द्वारा इस विषय पर संस्था की पत्रिका पी.पी.एस.टी. बुलेटिन, खंड १६ सितम्बर १९८८ में लिखे गए एक समग्र लेख के अलावा हमें अन्य संदर्भों से भी छुटपुट सामग्री मिली है।

मद्रास प्रेसीडेंसी के अन्य इलाकों के ज़िला दस्तावेज़ों में अंग्रेजी लेखकों के लिए तालाबों का ब्यौरा अंग्रेजी के दो-तीन प्रचलित शब्दटैंक और रिसर्वायर की संख्या मात्र में सिमट जाता है। इसलिए ऐरी शब्द का उल्लेख शायद ही कहीं देखने को मिलता है। लेकिन एक किताब अपवाद सिद्ध हुई है। श्री एच.एच. विल्सन द्वारा सन् १८५५ में लिखी 'ग्लासरि ऑफ ज्यूडिशियल रेवेन्यू टर्म्स एंड ऑफ यूसफुल वर्डस अकरिंग इन ऑफिशियल डाक्यूमेंट्स रिलेटिंग टु द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ द गवर्नमेंट' पुस्तक इस विषय से जुड़े अपने समाज की ठीक झलक देती है।

पालीवाल ब्राह्मणों से संबंधित प्रारंभिक सूचनाएं हमें श्री शुभू पटवा से प्राप्त हुई हैं।

महाराष्ट्र के चितपावन और देशरुख या देशमुख ब्राह्मणों की कथा पहले उल्लिखित 'जाति भास्कर' पुस्तक से ली गई है।

पुष्करणा ब्राह्मणों और पुष्कर सरोवर की संक्षिप्त जानकारी हमें कर्नल टॉड की प्रसिद्ध पुस्तक' ऐनल्स एंड एन्टीक्विटीस ऑफ राजस्थान' के परिवर्धित हिन्दी संस्करण 'राजस्थान का इतिहास' (संपादन श्री बी.आर.मिश्र, श्री जे.पी. मिश्र और श्री राय मुंशी देवी प्रसाद) से मिली है।

छत्तीसगढ़ के रामनामी संप्रदाय पर मध्य प्रदेश संदेश के अंकों में छुट-पुट जानकारियां हैं।

सागर के
आगर

तालाब के अंग-प्रत्यंग में आगौर के विभिन्न नाम हमें श्री चंडीप्रसाद भट्ट, पो. गोपेश्वर जिला चमोली, उ.प्र.; श्री राकेश दीवान; श्री गुणसागर सत्यार्थी, पो. कुंडेश्वर, टीकमगढ़, म.प्र. और गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली के श्री राजीव वोरा से मिले हैं।