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गान्धी
 


में पद-ग्रहण का प्रस्ताव काग्रेस ने स्वीकार किया। सन् १९३७ से १९३९ तक कांग्रेसी सरकारों को आदेश देते रहे और यह बतलाते रहे कि कौन-कौन से राष्ट्रनिर्माणकारी कार्य मत्रियो को करने चाहिये। महात्मा गांधी के आदेशानुसार ही काग्रेसी मत्रियो ने अपने-अपने प्रान्तों में हरिजन को सुविधाये--नौकरियॉ आदि--दी, खादी को प्रोत्साहन दिया, ग्राम-सुधार पर अधिक ज़ोर दिया, मादक-द्रव्यों का निषेध करने के लिये प्रयत्न किया तथा बुनियादी (Basic) शिक्षा-पद्धति को पाठ्यक्रम में स्थान दिया।

१ सितम्बर १९३९ को यूरोप में जर्मनी ने वर्तमान महायुद्ध छेड़ दिया, तब वाइसराय ने गांधीजी को ५ सितम्बर १९३९ को परामर्श के लिये शिमला आमत्रित किया। इस भेट के बाद ही गांधीजी ने एक वक्तव्य में यह कहा कि मेरी सहानुभूति ब्रिटेन तथा फ्रान्स के साथ है।

वाइसराय से समझौते की बातचीत करने के लिए वह दो-तीन बार शिमला तथा नयी दिल्ली गये। परन्तु मुलाक़ातों का कोई परिणाम नहीं निकला। अन्त में अपनी अन्तिम मुलाकात में गान्धीजी ने वाइसराय से यह मॉग पेश की कि काग्रेस को, जो अपने अहिंसा के सिद्धान्त के कारण युद्ध में योग नही दे सकती, भाषण-स्वातन्त्र्य का अधिकार दिया जाय, जिससे काग्रेसजन युद्ध के संबंध मे अपने विचार प्रकट कर सके। वाइसराय ने यह माँग स्वीकार नहीं की। फलतः अक्तूबर १९४० में उन्होने युद्ध-विरोधी वैयक्तिक सत्याग्रह आरम्भ कर दिया। दिसम्बर १९४१ में काग्रेस कार्य-समिति ने गान्धीजी को सत्याग्रह के संचालक-पद से मुक्त कर दिया और इस प्रकार सत्याग्रह स्थगित होगया।

महात्मा गान्धी काग्रेस को एक विचारधारा की अनुयायी संस्था बना देना चाहते हैं। इसलिए वह, जब यह देखते हैं कि दूसरी संस्थाएँ या दल कांग्रेस में शामिल होकर गान्धीवाद-विरोधिनी विचारधारा का प्रचार करते हैं, तो वह इसे सहन नही कर सकते। गान्धीजी प्रजातत्र के समर्थक हैं; परन्तु कांग्रेस मे आन्दोलन के संचालन के लिये अधिनायक-तंत्र को ही ठीक मानते हैं।

महात्मा गान्धी काग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेता हैं और संसार के एक अद्वितीय महापुरुष। वह अपने अहिंसा-प्रेम के लिये विश्व-विख्यात है। वह न केवल नेता ही हैं प्रत्युत् एक उच्चकोटि के विचारक, साधक, अँगरेज़ी