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चीन
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परम्परागत केन्द्र दक्षिण-चीन की राजधानी नानकिग् में डा० सन यात-सेन ने प्रगतिशील प्रजातन्त्र-शासन की स्थापना की। चीन के उत्तरी तथा दक्षिणी प्रान्तो में सदैव संघर्ष रहा है। वर्षों गृह-कलह चला; उत्तर और दक्षिण प्रदेश ही नहीं लड़ते रहे, बल्कि अनेक सेनापति अपने प्रभाव के प्रान्तों में शासन स्थापित करते और एक-दूसरे से लड़ते रहे। सन् १९२३ में डा० सन यात-सेन ने को मिन ताग्—चीन की राष्ट्रीय क्रान्तिकारी-सस्था--का, सोवियट सलाहकार वोरोडिन के सहयोग से, सगठन किया। तब से सोवियट रूस बराबर चीन की राज-क्रान्तियो में दिलचस्पी लेता रहा है। सन् १९३१ और १९३२ में चीन का नया शासन-विधान बनाया गया। को मिन तांग की राष्ट्रीय-कांग्रेस सर्वोच्च राष्ट्रीय सत्ता है। काग्रेस केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति (Cential Executive Committee) की नियुक्ति करती और यह समिति राष्ट्रीय सरकार बनाती है। सरकार के पॉच विभाग हैं-( १ ) शासन-प्रबन्ध, (२) व्यवस्था ( कानून ), ( ३ ) न्याय, (४) परीक्षा, (५ ) नियंत्रण। यह विभाग 'यूआन' कहलाते हैं। शासन-प्रवन्ध-विभाग ही वास्तव में सरकार है और इसके प्रमुख का पद दूसरे देशों के प्रधान-मंत्री के बराबर है। इसके अतिरिक्त एक राज-परिषद् ( State Council ) भी हैं । यह सरकार की सर्वोच्च संस्था है। इसका अध्यक्ष ही राष्ट्रीय सरकार का राष्ट्रपति होता है। शासन-प्रबंध-विभाग के अध्यक्ष चीन के एक महाजन (वेकर) डा० कुग् हैं, जो नियाग काई-शेक के साटू हैं। स्वर्गीय डा० सन यात-सेन से भी उनका यही नाता था।

जब चीन में आन्तरिक कलह कुछ शान्त होगया, तब बाहरी आक्रमण होने लगे और जापान ने उस पर हमला कर दिया। सन् १९३१ में जापान ने चीन के मंचूरिया प्रान्त पर अधिकार जमा लिया और वहाँ दिखावटी मन्चूरो राज्य की स्थापना कर दी। सन् १९३२ में शंघाई ने दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। चियांग ई-शेक ने समझौता कर लिया, क्योंकि वह जापान के भावी अनिवार्य आक्रमण के मुक़ाबले के लिये, जो समस्त चीन को हड़प जाने के इरादे से था, चीन की विभिन्नता नष्ट कर एकता और संगठन पैदा करना चाहे थे। और इसके लिये समय और शांति की आवश्यकता थी। संधि हो गई, परन्तु जुलाई १९३७ मे ७ ता० ३ चीनी जापानी सिपा-