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ज़मींदारी-प्रथा
 


के अभाव के कारण जर्मनी की पराजय हुई। इसकी पुनरावृत्ति न हो, इसलिए समस्त सबल विरोधियो को हटाकर नात्सी जर्मन अपनी जाति को लौह अनुशासन मे सङ्गठित करके वर्तमान युद्ध द्वारा संसार मे 'नवविधान' (World New Order) की रचना करना चाहते हैं।

१९३५ में जर्मनी में सार्वजनिक सैनिक-शिक्षा पुनः जारी की गई। इन दिनो अनुमानतः पचास लाख सेना वहाँ है। यह सेना मुकम्मल तौर पर यान्त्रिक शस्त्रास्त्र से ल्हैस है, जिसमे कितने ही वख्तरपोश डिवीजन हैं। १५ से ३० हजार तक वायुयान नात्सी-सेना में अनुमान किये जाते हैं। नात्सी युद्ध-कला यन्त्रोपयोग की महत्ता और पंचम पक्ति के प्रयोग पर आधारित है।

जर्मन नौ-सेना मे २ युद्ध-पोत, ३ छोटे युद्ध-पोत, ६ क्रूज़र, ३१ ध्वसक, ६५ यू-बोट युद्धारम्भ के समय थे। इनके अतिरिक्त कई युद्ध-पोत आदि बन रहे थे। जून १९४१ तक उसकी जलीय हानि की गणना की जाय तो वह इससे बहुत अधिक होती है। लेकिन शायद जर्मनी अपनी इस कमी की पूर्ति जहाँ-की-तहाँ करता जा रहा है। जर्मनी ने ता० १ सितम्बर १९३९ को पोलैण्ड पर आक्रमण कर महायुद्ध छेड़ दिया। उसने पोलैण्ड, नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क, बेलजियम, हालैण्ड, फ्रान्स, चैकोस्लोवाकिया, रूमानिया, यूनान, कीट आदि देशो को अधिकृत कर लिया है।

जर्मन-सोवियट-समझौता--२४ अगस्त १९३९ को सोवियट रूस और जर्मनी में अनाक्रमण-समझौता हुआ था, जिसके अनुसार निश्चय हुआ कि जर्मनी और रूस एक दूसरे के देश पर आक्रमण नही करेंगे। यह समझौता १० वषों के लिये हुआ था। किन्तु २० जून १६४१ को हिटलर ने इस समझौते की अवहेलना करके रूस पर आक्रमण कर दिया। आज सवा साल से इन दोनो राष्ट्रो में भीषण युद्ध होरहा है।

ज़मीदारी-प्रथा--भारत के सयुक्त-प्रान्त, बिहार, उड़ीसा, बंगाल, मदरास तथा देशी राज्यो मे जमीदारी प्रथा प्रचलित है। इसके अनुसार जो लोग ज़मीन के स्वामी होते हैं वे किसानो को ज़मीन, पैदावार के लिये, मनमाने लगान पर उठा देते हैं, और किसान से वसूल हुए लगान मे से एक निश्चित मालगुज़ारी की शकल मे, सरकार को देते है। ज़मीदार लोग ख़ुद काश्त-