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अग्रगामी दल
 


देदिया तब उन्होने ३ मई १९३९ को कांग्रेस के अन्तर्गत अग्रगामी दल बनाने की घोषणा की। अपने कलकत्ते के भाषण में उन्होने कहा कि इस दल का उद्देश्य उन लोगों को एकत्र करना है जो कांग्रेस की समझौतावाली नरम नीति एव साम्राज्यवाद के विरोधी हैं। "यह दल कांग्रेस का अंग रहेगा, उसके वर्तमान विधान, लक्ष्य, नीति और कार्यक्रम की मानेगा, महात्मा गांधी के व्यक्तित्व का सम्मान करेगा और उनके अंहिसात्मक असहयोग के राजनीतिक सिद्धात मे पूर्ण विश्वास रखेगा।" जून १९३९ के अन्तिम सप्ताह मे अग्रगामी दल का प्रथम सम्मेलन हुआ और उसमे उसका कार्यक्रम निर्धारित किया गया। उसका मुख्य कार्यक्रम इस प्रकार रखा गया—(१) कांग्रेस को स्थिर स्वार्थवाले पूँजीवादियों से बचाना। (२) ऐसा कार्य करना जिससे कांग्रेसी मन्त्रिमण्डलों का कांग्रेस पर प्रभुत्व स्थापित न होने पावे। (३) कांग्रेस को जनतावादी तथा उग्रवादी बनाया जाय। (४) किसान-मजदूर आन्दोलन को मदद दी जाय। (५) कांग्रेस तथा अन्य साम्राज्य-विरोधिनी संस्थाओं मे एकता स्थापित करना। (६) अखिल भारतीय स्वयंसेवक-दल बनाना। (७) देशी रियासती जनता के आन्दोलनों में उसकी सहायता करना। (८) संघ-शासन का बगैर समझौता किए विरोध करना। (९) साम्राज्यवादी महायुद्ध मे भारतवर्ष को शामिल न होने देने का प्रचार करना। (१०) विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करना। (११) आज़ादी की लड़ाई को शीघ्र ही आरम्भ करने की तैयारी करना।

अपने जन्म-काल से इस दल ने कांग्रेस के भीतर उपर्युक्त कार्यक्रम को सामने रखकर कार्य किया और आज भी उसका अस्तित्व है। परन्तु कांग्रेस के अधिकारियों ने सदैव इस दल को अनावश्यक बतलाया और इसकी भरसक निंदा भी की।

समस्त प्रांतो में प्रातिक तथा ज़िला अग्रगामी दल बन गये। रामगढ कांग्रेस-अधिवेशन के साथ समझौता-विरोधी सम्मेलन भी सुभाष बाबू के सभापतित्व में हुआ। कांग्रेस की उच्चसत्ता निरन्तर सुभाष बाबू का विरोध