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तिलक
 


यह बबई-धारासभा के सदस्य चुने गए। दो वर्ष बाद पूने मे प्लेग महामारी फूट पड़ी। प्लेग से रक्षा के लिए सरकार ने बड़ी कड़ाई के साथ स्वास्थ्य-सबधी नियमो के पालन पर जोर दिया और इसकी व्यवस्था का भार गोरे सैनिको के हाथों में सौप दिया। सैनिक जनता को हर प्रकार से तंग करने लगे। इन्हीं दिनो दामोदर हरि चापेकर नामक एक व्यक्ति ने प्लेग-समिति के अध्यक्ष मि० रैण्ड की हत्या कर दी और लेफ़्टिनेन्ट आयरेट नामक एक अफसर भी मार दिया गया। ऐग्लो-इडियन समुदाय और उनके पत्रों ने गुहार मचानी आरम्भ की और शासको द्वारा आतक की वृद्धि हुई। लोकमान्य तिलक ने अपने किसी लेख में शिवाजी द्वारा अफजलखाॅ के वध को नीतिविहित सिद्ध किया था। आवाज उठने लगी कि तिलक राजनीतिक हत्याओं को उत्तेजना देते हैं। इनसे समस्त देश में बड़ी सनसनी फैल गई। तब 'केसरी' में प्रकाशित कुछ लेखो के कारण लोकमान्य पर राजद्रोह का मुकद्दमा चला और उन्हें १८ मास क़ैद की सज़ा दी गई। इस जेल-जीवन में लोकमान्य ने वेदो में खोज करके 'ओरायन' नामक ससार-प्रसिद्ध ग्रन्थ की अँगरेंजी मे रचना की। प्रसिद्ध योरपीय विद्वान् प्रो० मेक्समूलर इससे बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने महारानी विक्टोरिया को लिखा और लोकमान्य ६ मास पूर्व जेल से छोड़ दिये गये। लोकमान्य प्रथम बार १८९० में कांग्रेस में शामिल हुए थे। फिर जब १८९५ में पूना में अधिवेशन हुआ तो आपको स्वागत-समिति का मन्त्री बनाया गया। काग्रेस में तब माडरेट लोगो का ही बोलबाला था। पर लोकमान्य काग्रेस को तीन दिन के तमाशे के बजाय निरन्तर कार्यशील और जागरूक सस्था बनाना चाहते थे। १९०५ में जब लार्ड कर्जन ने बंगाल के दो टुकडे कर दिए और फलत: उसके विरुद्ध देशव्यापी आन्दोलन उठा तो तिलक ने पैसा-फंड खोला और आन्दोलन के सचालनार्थ लाखो रुपये इकट्ठा हो गये। सन् १९०७ में सूरत में काग्रेस का अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में तिलक के गरम दल और रासबिहारी घोष तथा सुरेन्द्रनाथ आदि के नरम दल के बीच जोरो का सघर्ष हुआ और फलत: काग्रेस पर कुछ वर्षों के लिए माडरेटो का आधिपत्य और भी प्रबल हो गया। 'केसरी' के कुछ लेखो के कारण लोकमान्य को २४