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नेहरू
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गया। सरकार इस बार आप पर कुछ प्रतिबन्ध लगाकर छोडना चाहती थी, किन्तु आपने शर्तबन्द रिहाई को नामंजूर कर दिया। छूटते ही आप स्विट्ज़रलैड गये जहाँ कमलाजी इलाज के लिए भेजी गई थीं और इन दिनों अपनी अन्तिम अवस्था में पड़ी थीं। सन् '३५ तक पण्डित नेहरू बराबर काग्रेस के मन्त्री चुने जाते रहे।

१९३६ मे देश ने आपको कांग्रेस का फिर प्रेसिडेन्ट चुना और १९३७ मे भी आपही अध्यक्ष निर्वाचित हुए। इस समय, सार्वजनिक चुनावो के अवसर पर, आपने देश का अथक तूफानी दौरा किया। चुनावो मे, इस कारण, ज़बरदस्त सफलता मिली।

सन् १९३८ मे आप पुनः योरप गये। गृह-युद्ध-ग्रस्त स्पेन और चीन का भी आपने भ्रमण किया। सन् १९३९ के अन्तिम दिनो मे आपको गोरखपुर मे चार वर्ष कैद की सज़ा मिली। सन् १९४० मे व्यक्तिगत सत्याग्रह छिड़ा। सन् '४१ की आम रिहाई के समय आप छोड दिये गये। क्रिप्स प्रस्तावो की विफलता के बाद देश में उत्पन्न हुए वातावरण और 'भारत छोडो' प्रस्ताव के बाद, आपभी 8 अगस्त १९४२ के प्रातःकाल, बम्बई मे, गान्धीजी आदि अन्य नेताओं के साथ, पकड लिए गये।

वह राष्ट्र के उद्योगीकरण के पक्ष में हैं, और राष्ट्रीय उद्योग-निर्मात्री समिति के भी अध्यक्ष हैं। वह फ़ासिज़्म के

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भी उतने ही विरोधी हैं जितने साम्राज्यवाद के। कांग्रेस मे वह एक शक्ति हैं। उनमें विश्लेषणात्मक बुद्धि है तथा वह सिद्धान्तो के प्रेमी हैं। वह अग्रेज़ी के विद्वान् तथा उच्च कोटि के लेखक हैं। उनकी अग्रेज़ी लेखनशैली की आक्सफर्ड के प्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर ऐडवर्ड टाम्सन और सुविख्यात अँगरेज़ लेखक मि० गुन्थर ने बहुत प्रशंसा की है। अग्रेज़ी में उनकी "मेरी कहानी", "विश्व इतिहास की झलक," "हिन्दुस्तान की सम-