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पाकिस्तान
 


शुरू कर दिया है कि भारतवर्ष प्रजातंत्र के अनुकूल नही है। भारत में कोई एक राष्ट्र नही है। इस देश मे हिन्दू और मुसलमान दो राष्ट्र है। पूर्व की भॉति भारतीय मुसलिमो को वह अल्पसंख्यक सम्प्रदाय न मानकर अलग एक जाति कहने लगे हैं। दोराष्ट्र-सिद्धान्त के आधार पर पिछले लाहौर के मुसलिम-लीग अधिवेशन, मार्च १९४०, मे एक प्रस्ताव स्वीकार किया गया था, जिसका आशय यह है कि भारत के भावी शासन-विधान के अन्तर्गत यहाँ दो अलग-अलग राज्य स्थापित किये जायॅ : एक हिन्दोस्तान, जिसमे समस्त भारत तथा देशी राज्य शामिल हैं (परन्तु हैदराबाद तथा बगाल प्रान्त शामिल नहीं हैं)। दूसरा पाकिस्तान, जिसमे पजाब, सिन्ध, सीमाप्रान्त, बलोचिस्तान के सूबे तथा काश्मीर-जम्मू, मडी, चम्बा, सुकेत, फरीदकोट, बहावलपुर, नाभा, पटियाला, कपूरथला, मलेरकोटला, दारेक़लात, लोहारू, बिलासपुर के पंजाबी तथा शिमला के पहाडी राज्य शामिल है। इसके अनुसार बंगाल-प्रान्त मे अलग मुसलिम-राज्य क़ायम होगा।

पाकिस्तान योजना का भारतीय राष्ट्रीय महासभा (काग्रेस), भारतीय राष्ट्रीय उदार सघ (लिबरल फैडरेशन), सिख लीग, दलित जाति-सम्मेलन तथा प्रत्येक हिन्दू-सिख सस्था ने घोर विरोध किया है। अनेक मुस्लिम संस्थाएँ भी इस योजना को देश के लिये विनाशकारी समझती हैं, तथा देहली मे अ० भा० आज़ाद मुस्लिम-सम्मेलन, अप्रैल १९४०, के देहली अधिवेशन में इसका घोर विरोध किया गया था। इसके अतिरिक्त मजलिसे अहरार, जमीअतुलउलमा-इ-हिन्द, भारतीय शिया कान्फरेन्स, बिहार मुसलिम स्वतत्र-दल, अजुमने वतन, अ० भा० मोमिन सम्मेलन तथा सभी राष्ट्रवादी मुसलमानो ने एक स्वर से पाकिस्तान का घोर विरोध किया है। मोमिन सम्मेलन ने तो १९४१ और '४२ मे भारत-मन्त्री को तार देकर सूचित किया था कि भारत के चार करोड़ मोमिन पाकिस्तान के विरोधी हैं और वह मि० जिन्ना को सब मुसलमानों का काइदे-आज़म (प्रमुख नेता) नही मानते। अपनी कान्फरेन्सों में वह अनेक बार इसका विरोध कर चुके हैं।

मुसलिम लीग-कार्यकारिणी के सदस्य और पजाब सरकार के प्रधानमंत्री सर सिकन्दर हयात खॉ मरहूम ने कभी खुलकर इस मसले का समर्थन