पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२१७

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ब्रह्मी २११ के योग्य बनाने की घोपणा की थी। तात्कालिक बर्मा-सरकार-कानून १९३५ के अनुसार व्रहमा म व्यवस्थापक-मण्डल बना दिया गया था, जिसकी सीनेट के ३६ सदस्यों में से अधिो को ब्रिटिश गवर्नर नियुक्त करता था तथा शेप प्रतिनिधिसभा द्वारा चुने जाते थे । प्रतिनिधि-सभा मे १३२ सदस्य थे, जिनका चुनाव होता था। शासन-प्रणाली भारतीय प्रान्तों के अनुकूल थी । ब्रह्मा का राष्ट्रीय नेता डा० वा मौ वहाँ का सर्वप्रथम प्रधान मन्त्री बना । ब्रह्मा-चीन-पथ बनाये जाने के सबंध मे मतभेद होजाने के कारण डा० मौ ने त्याग-पत्र दे दिया। वह कदाचित् जापानी प्रभाव में था और नहीं चाहता था कि यह सडक बने । उसका कहना था कि इस सड़क के जरिये ब्रह्मा मे चीनियो के प्रवास का मार्ग खुल जायगा। १९४० मे उसे, वर्मा-रक्षा-कानून के अनुसार, एक साल कैद की सजा दी गई । वर्मा के गवर्नर ने घोषित किया कि बर्मा को स्वराज्य देने के विषय पर लड़ाई के बाद बातचीत कीजायगी । ऊ सा बर्मा का प्रधान मन्त्री बना । अक्टूबर '४१ मे वह, लडाई के उपरान्त ब्रह्मा को तत्काल औपनिवेशिक पद दिये जाने का, वचन प्राप्त करने के लिये लन्दन गया, किन्तु चर्चिल की सरकार ने उनकी एक न सुनी । लन्दन से लौटते समय ऊ सा को बीच में ही पकड़वर कैद कर लिया गया । | शान रियासते ३४ हैं । इनके राजा, ब्रिटिश अफसरों की सलाह से, अपना शासन चलाते थे । जापानी अाक्रमण के समय कुछ बम फ़ौज शत्रु से मिल - - गई। दमके पतन के बाद वर्मा-मरकार भारन गई और शिमला में उस दर पर है। समिलित राष्ट्रों (एम , ब्रिटेन शोर चीन) ने पिछले गत ४२ से ही दो वापस त्रित व शारा

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