पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२२६

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२२० ब्रिटिश-मैना ब्रिटिश-सेना–वर्तमान महायुद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व ब्रिटिश-सेना के तीन अग थेः ( १ ) स्थायी सेना—इसमे सैनिक सात वर्ष के लिये भर्ती किये जाते हैं, किन्तु आगामी ५ वर्ष तक, रक्षित सैन्य की मॉति, अावश्यकता पड़ने पर. इसके सैनिकों को बुलाया जा सकता है । इसमें १,६४,००० सैनिक रहते थे । जिनमे ५७,००० सैनिक भारत में थे और इनका व्यय भारत-सरकार को देना पडता था । ( २ ) देश-रक्षिणी सेना-यह नागरिको की सेना है। इसमें चार वषों तक शिक्षण की व्यवस्था है । इस सेना के सैनिकों के व्यावसायिक अथवा नागरिक धन्धो मे कोई बाधा नहीं पड़ती थी, सायकाल की कवायद में केवल सप्ताह में एक बार अथवा सालाना शिविर में शामिल होना पड़ता था । अप्रैल १९३६ मे यह सेना दूनी कर दी गई और इसकी सख्या ४,४०,००० होगई । इस सेना में एक स्त्री-सेना की शाखा भी हैं, जो असैनिक सहायक कार्य करती हैं। ( ३ ) अनिवार्य नागरिक सेना । २६ मई १९३९ के मिलिटरी ट्रेनिग् ऐक्ट (सैनिक-शिक्षण कानून) के अनुसार प्रत्येक २० वर्ष के या इससे अधिक आयु के स्वस्थ पुरुप को इसमे ६ महीने के लिये भरती होना अनिवार्य हैं । युद्ध प्रारम्भ होजाने पर यह समस्त सेनाएँ मिलाकर एक कर दी गई । १८ से ४१ वर्ष के लोगों को सेना में भरती होना अनिवार्य कर दिया गया । १६४१ के पतझड तक २० और ३६ वर्ष के बीच की आयु वाले लगभग ६० लाख आदमी इसमे भरती हुए और २० लाख सशस्त्र सैनिक तैयार होगये । १९४१ के दिसम्बर मे अनिवार्य भरती की उम्र पुरुषों के लिये ५० और स्त्रियो के लिये ३० वर्ष कर दीगई । जून १९४० मे नागरिक स्वयसेवको का मुल्की गारद जर्मन छतरी-सैनिको से लड़ने के लिये बना। इसके सदस्य अपना कारबार करते हुए फालतू समय में सैनिक कार्य करते हैं। आवश्यकता के अवसर पर पूरे समय के लिये बुला लिये जाते हैं। इनकी सेवाओं को अनिवार्य भी बनाया जा सकता है । इन सेनाओं के अतिरिक्त समुद्र पार की भारतीय तथा अनेक उपनिवेशो की सेनाएँ अलग हैं ।