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भारत
 

जेल गये तथा अनेक लाठियों और गोलियों से मारे गये। तत्कालीन वाइसराय, लार्ड इरविन अब लार्ड हैलीफैक्स, जब दमन से हार गये, तब उन्होंने १९३१ में कांग्रेस से समझौता किया, जो गांधी-इरविन समझौते के नाम से प्रसिद्ध है। फलतः गांधीजी ने गोलमेज सभा में शामिल होना स्वीकार किया। गोलमेज़ की दूसरी बैठक सन् १९३२ में भी लन्दन में हुई, किन्तु गांधीजी पहली बैठक से ही निराश लौटे थे। हिन्दू-मुसलिम प्रश्न खड़ा कर दिया गया और कोई विशेष प्रतिफल इस सम्मेलन का नहीं निकला और देश की राष्ट्रीय माँग के प्रतिकूल नया शासन-विधान भारत पर लादा गया।

१९३५ में यही भारतीय शासन-विधान लागू हुआ। इसमें भारत को केन्द्र में उत्तरदायी शासन देने की व्यवस्था नहीं की गई। प्रान्तों में भी नियंत्रित तथा मर्यादित उत्तरदायी शासन की स्थापना करने की योजना शामिल की गई। इस शासन-विधान में ४७८ धाराएँ और १६ परिशिष्ट हैं। यह जितना ही बड़ा है, उतना ही अधिक अनुत्तरदायी भी। इस विधान की रूप-रेखा इस प्रकार है:––

(१) केन्द्रिय सरकार––भारत में गवर्नर-जनरल ब्रिटिश राजा का प्रतिनिधि है और वास्तव में भारत का एकमात्र शासक। १८ अप्रैल १९३६ से लार्ड लिनलिथगो वाइसराय और गवर्नर-जनरल के पद पर हैं। (यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि पार्लमेन्टरी संयुक्त कमिटी, जिसने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया बिल पर अपनी रिपोर्ट दी थी, के अध्यक्ष भी लार्ड लिनलिथगो ही थे।) गवर्नर-जनरल की सामान्य अवधि पाँच वर्ष नियत है। किन्तु ब्रिटेन का राजा इसमें वृद्धि भी कर सकता है। गवर्नर-जनरल की सहायता के लिये एक कार्यकारिणी कौंसिल है, जिसमें सामान्यतः तीन देशी, तीन अँगरेज़, ६ सदस्य रहते थे, किन्तु अब बढ़ते-बढते १५ हो गये हैं। इनकी नियुक्ति राजा द्वारा होती है। प्रत्येक सदस्य भारत-सरकार के एक या अधिक विभागों का अध्यक्ष होता है। भारत का प्रधान सेनाध्यक्ष भी इस कौंसिल का सदस्य होता है। गवर्नर-जनरल इसका अध्यक्ष रहता है। परराष्ट्र विभाग गवर्नर-जनरल के अधीन रहता है।

भारतीय व्यवस्थापक मण्डल में दो सभाएँ हैं––लैजिस्लेटिव असेम्बली