पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२३६

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२३० भारत जेल गये तथा अनेक लाठियो और गोलियों से मारे गये । तत्कालीन वाइसराय, लार्ड इरविन अब लार्ड हैलीफैक्स, जव दमन से हार गये, तब उन्होने १९३१ मे काग्रेस से समझौता किया, जो गाधी-इरविन ममझौते के नाम से प्रसिद्ध है । फलतः गांधीजी ने गोलमेज सभा में शामिल होना स्वीकार किया । गोलमेज़ की दूसरी बैठक सन् १९३२ मे भी लन्दन में हुई, किन्तु गांधीजी पहली बैठक से ही निराश लौटे थे । हिन्दू-मुसलिम प्रश्न खडा कर दिया गया और कोई विशेष प्रतिफल इस सम्मेलन का नहीं निकला और देश की राष्ट्रीय मॉग के प्रतिकृल नया शासन-विधान भारत पर लादा गया । १९३५ मे यही भारतीय शासन-विधान लागू हुआ। इसमें भारत को केन्द्र में उत्तरदायी शासन देने की व्यवस्था नहीं कीगई । प्रान्तो में भी नियत्रित तथा मर्यादित उत्तरदायी शासन की स्थापना करने की योजना शामिल कीगई । इस शासन-विधान में ४७८ धाराएँ और १६ परिशिष्ट हैं । यह जितना ही बडी है, उतना ही अधिक अनुत्तरदायी भी । इस विधान की रूप-रेखा इस प्रकार है: | ( १ ) केन्द्रिय सरकार--भारत में गवर्नर-जनरल ब्रिटिश राजा का प्रतिनिधि है और वास्तव में भारत का एकमात्र शासक । १८ अप्रैल १६३६ से लार्ड लिनलिथगो वाइसराय और गवर्नर-जनरल के पद पर हैं । ( यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि पार्लमेन्टरी सयुक्त कमिटी, जिसने गवर्नमेटाफ इडिया बिल पर अपनी रिपोर्ट दी थी, के अध्यक्ष भी लार्ड लिननिथगो ही थे।) गवर्नर-जनरल की सामान्य अवधि पाँच वर्ष नियत है । किन्तु ब्रिटे नका राजा इसमे वृद्धि भी कर सकता है । गवर्नर-जनरल की सहायता के लिये एक कार्यकारिणी कौंसिल है, जिसमें सामान्यतः तीन देशी, तीन अँगरेज़, ६ सदस्य रहते थे, किन्तु अब बढ़ते-बढते १५ होगये हैं। इनकी नियुक्ति राजा द्वारा होती है । प्रत्येक सदस्य भारत-सरकार के एक या अधिक विभागों का अध्यक्ष होता है । भारत का प्रधान सेनाध्यक्ष भी इस कौसिल का सदस्य होता है । गवर्नर-जनरल इसका अध्यक्ष रहता है । परराष्ट्र विभाग गवर्नर-जनरल के अधीन रहता है । भारतीय व्यवस्थापक मण्डल में दो सभाएँ हैं—लैजिस्लेटिव असेम्बली