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पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/२५४

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भारतीय राष्ट्रीय महासमा

लन करना है । यह असहयोग, सत्याग्रह तथा ‘सीधे कार्य’ के विरुद्ध है । इसका लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्य का अन्तर्गत औपनिवेशक स्वराज्य प्राप्त करना है । यह दल सरकार की नीति, शासन-प्रबन्ध तथा वैधानिक समस्याओं पर सरकार की नीति की आलोचना करता है, असंतोष प्रकट करता है तथा निदा भी करता है । परन्तु निष्क्रियता तथा परमुखापेक्षिता ही इसकी राजनिति की रीढ़ है ।

यह संस्था उच्च वर्ग अर्ध-सरकारी तथा सरकार के कृपापात्रो और ‘राजभक्तो’ की सस्था है । इसमें देश के बड़े-बड़े पूजिपति, बैंकर, मिल-मालिक शामिल है । जनता ने इसका कोई संपर्क नहीं, और न जनता में इस सस्था का कोई प्रभाव ही है । प्रति वर्ष दिसंबर में देश के किसी बड़े नगर में इसके सालाना अधिवेशन होते हैं । वर्तमान मैं प्रान्तीय धारासभाओं में इस दल का कोई प्रभाव नहीं रहा । इस दल में तेजबहादुर सप्र, स्वर्गीय सर सी०वाई०चिन्तामणि और आनरेबल प० हृदयनाथ कुंजरू आदि सरीखे विद्वान् और देशप्रेमी व्यक्ति भी है और रहे है, जिनपर कोई भी देश् गर्व कर सकता है । सर् चिर्राउरी यजेश्वर चिन्तामणि ने तो, १६१६ के विधान के अनुसार बनी प्रांतीय धारा-सभा में, सदस्य की भॉति और उसके उपरान्त मिनिस्टर की हैसीयत से, देश् की प्रशंसनीय सेवाये की, और ‘लीडर’ के सम्पादक की स्थिति में तो उनकी देश-सेवाएँ अनुपाततः बहुमूल्य हुई है । उनकी अतुलनीय प्रतिभा और संपादन-निपुणता तथा मानसिक सदाशयता पर आज भी और आगामी स्वतंत्र भारत समुचित रूप से गर्व करता रहेगा ।

भारतीय राष्ट्रीय महासमा-यह भारत की सबसे महान्, प्रभावशाली तथा शक्तिशाली राष्ट्रीय संस्था है । सन् १८८५ में, ऐलन ऑक्टेवियन ह्यू म नामक एक पेंशनर सिविलियन ने, भारतीय राष्ट्रीय महासभा (काग्रेस) की स्थापना में प्रमुख भाग लिया । दिसम्बर १८८५ में इसकी स्थापना बम्बई में की गई । प्रारंभ मे इसका उद्देश, ब्रिटीश साम्राज्य की छत्रछाया में, भारतीयों के लिये क्रमश: अधिकार प्राप्त करने का प्रयत्न करना था । पुलिस, सेना तथा सरकार के उच्च विभागो में उच्च पदो पर भारतीयों की नियुक्तियों के लिये आन्दोलन करना ही इसका मुख्य उद्देश था । सन् १६०७ में, सूरत-