पुत्र । ६ वर्ष की आयु मे ही पिता का देहान्त होगया । रियासत कोर्ट ग्राफ् वाड्स के संरक्षण मे होगई । बी० ए० तक शिक्षा प्राप्त की । १९०३ में सपत्नीक योरप यात्रा की । सन् १६०६ मे औद्योगिक शिक्षा के प्रचारार्थ, जिसमे राजा साहब की विशेष रुचि थी, वृन्दावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की । २०,०००) सालाना की ग्रामदनी की जमीदारी तथा निजी राजभवन विद्यालय को दान मे दे दिये । गुरुकुल वृन्दावन को अक्टूबर १६११ मे, १५,००० मूल्य की भूमि दी । इसी भूमि पर गुरुकुल विश्वविद्या- लय का भवन बनाया गया है । हिन्दी साप्ताहिक 'प्रेम' की स्थापना की तथा उसका सपादन किया । सन् १६१२ में दूसरी बार योरप गये तथा सन् १६१४ मे तीसरी बार । साथ मे गुरुकुल कॉगडी के प्रथम स्नातक, महात्मा मुन्शीराम ( स्व ० स्वामी श्रद्धानन्द ) के वडे पुत्र हरिश्चन्द्र विद्या- लङ्कार को अपना प्राइवेट सेक्रेटरी बनाकर लेगये । उसी समय से वह स्विट्- ज़रलैण्ड, जर्मनी, फ्रान्स, तुर्किस्तान, सोवियत रूस, अफगानिस्तान, जापान यदि मे भ्रमण कर भारतीय स्वाधीनता के पक्ष में लोकमत बनाते और विश्वबन्धुत्व का प्रचार करते रहे हैं । राजा साहब मानवतावाद के प्रबल समर्थक हैं । इसी भावना से प्रेरित होकर, सन् १६१२ मे, सबसे पूर्व, अछूत कहे जानेवाले सम्प्रदाय को इस प्रेम- पुजारी ने व्यावहारिक रूप मे अपनाया । विश्व बन्धुत्व तथा अन्तर्राष्ट्रीयता के वह पोषक और राष्ट्रीय स्वाधीनता के सच्चे उपासक हैं । उन्हे स्वदेश वापस आने की आज्ञा नहीं है । केन्द्रीय असेम्बली मे इस प्रतिबंध के हटाने का प्रयत्न किया गया, परन्तु सफलता नही मिली । पिछले तीन वर्षों से उनके सम्बन्ध मे कोई समाचार नहीं सुना गया । मार्क्सवाद -- कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तानुसार समाजवादी विचारधारा । मार्क्स का, यहूदी वश मे, जर्मनी मे, सन् १८१८ मे, जन्म हुआ और सन् १८८३ मे, लन्दन मे, मृत्यु । मार्क्सवाद भौतिकतावादी समाज-शास्त्र है । वह जर्मन दार्शनिक, हीगल, और अँगरेज अर्थशास्त्री, रिकार्डो, के द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर आश्रित है । उसकी दृष्टि मे मानव की समस्त श्राध्यात्मिक, मानसिक और सासारिक उन्नति तथा उसके विकास का मूलाधार आर्थिक है ।
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