पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/३१३

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रवीन्द्रनाथ ३०७ दूसरी बार आप फिर श्रीसत्येन्द्रनाथ के साथ योरप-यात्रा करने गए। फ्रान्स, इटली और इगलैण्ड घूमे । वापस आने पर आपने 'साधना' नामक बॅगला पत्रिका निकाली। इन्ही दिनों आपने चित्रांगदा नामक नाटक लिखा, जो आपके उत्कृष्ट नाटको मे है । सन् १६०१ मे रवि बाबू शान्ति-निकेतन मे रहने और वहाँ एक विद्यालय खोलकर बालको को पढाने लगे । इस समय आपको अार्थिक संकट का सामना करना पडा। पुरी का अपना मकान तथा पत्नी के सब ग्राभूषण वेच देने पडे । सन् १६०२ मे आपकी पत्नी का स्वर्गवास होगया। तब से आपने अन्त काल तक एकान्त-जीवन व्यतीत किया । __वङ्गभंग के समय आपका कवि-हृदय काल्पनिक जगत् से परे कर्मक्षेत्र मे अवतरित हुआ और अपनी कवितायो तथा लेखमाला द्वारा आन्दोलन मे योगदान दिया । अनेक सभात्रो मे आपने, इस सम्बन्ध मे, भाषण दिए । राष्ट्रीय-कोष के लिए आपने जनता से अपील की और ५०,०००) संग्रह किए । इस समय आपने अपने 'गोरा' उपन्यास तथा गीताञ्जलिं की रचना प्रारम्भ की। सन् १९१२ मे आपके शान्ति-निकेतन ने एक राष्ट्रीय शिक्षण-संस्था का रूप धारण कर लिया ।। इसी वर्ष कविवर ने गीताञ्जलि का अँगरेजी मे अनुवाद प्रारम्भ किया । सन् १९१३ मे पुनः इंगलैण्ड गये । वहाँ के साहित्यिको तथा कवियों में आपका बडा सम्मान हुआ । 'इंडिया सोसाइटी' ने आपकी गीताञ्जलि को प्रकाशित किया । डब्ल्यू० बी० यीट्स ने उसकी प्रस्तावना लिखी । इस पुस्तक की बडी सराहना हुई । सितम्बर १६१३ मे आप योरप से वापस आये। इसी वर्ष नवम्बर मे आपको एक लाख रुपये से अधिक रकम का नोबेल पुरस्कार आपकी गीताञ्जलि आदि रचनात्रो पर मिला । आपकी रचनाओं की संसार मे धूम मच गई । सन् १९१४ में गवर्नमेंट हाउस कलकत्ता मे बंगाल के गवर्नर ने विश्व- कवि का सम्मान तथा अभिनन्दन किया । इसी वर्ष महात्मा (तव कर्मवीर) गांधी ने विश्व-भारती शान्ति-निकेतन की यात्रा की । आपकी विश्व प्रशन्सित रचनात्रों के कारण सरकार ने अापको 'सर' की उपाधि से विभूपित किया