पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/३६७

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शानित-प्रतिज्ञ-सघ

वाही का विरोध किया । सऩ १६४१ मे भारत-सरकार ने आपाको नजरबन्द कर दिया और वह जैल मे है । शाख्त, डा० जालमर होरास ग्रीले -जर्मन आथ्शास्त्री तथा राज्नीतिज्ञ; १८७७ मे पैदा हुआ; बकेर बना; एक बैन्क मे मैनेजर तथा हिस्सेदार रहा; युध्द कके बाद जर्मन प्रजातन्त्र्वादी दल मे शामिल हुआ और १६२३ के जर्मनी के आथिक-पतन के समय जर्मन-करेन्सी की सिथ्ररता के लिये उसने प्रयन किया; जर्मन राष्ट्रिय बैक का प्रधान बना और १६२६ तक इस पद रहा ।युध्द का हरजाना देने का उसने विरोध किया और जर्मनी द्वरा विदेशो से क्रज्र लिये जाने की नीति मे भी उसने परिवतन करया ।सन १६३१ मे वह नात्सी-दल के साम्प्र्क मे आया । सन १६३३ मे हिट्लर ने उसे पुन:राइख बैक का आध्यक्ष बनाया ।उसे अथ-मत्री भि नियुक किया गया और वस्तुत:वह जर्मनी का अथ-आधिनायक बन गया । उसने जर्मनी की आथिक अवस्था को सुहढ रुप मे सगठिक किया ।१६३६ मे हिट्लर ने उसको आदरसुचक तमगा दिया । सन १६३८ मे गाऔ रिग के प्रभुत्व के कारन उसे आथमत्रित्व तथा बैक की प्रधानता से त्यागपत्र देना पडा ।क्युन्कि चह गौरिग़् की चातुव्शिया यौजना का विरोधी था । सन १६३६ के ग्रीश्म-काल मे वह भारत आया और लडाई शुरु होते ही जर्मनी वापस चला गया, और इस समय, कहा जाता है, डा० शाख्न्त हिटलर को आथिक युध्द-प्रयतो मे सलाह देकर उसकी सहयता कर रह है । शानित-प्रतिज्ञ -सघ- ब्रिटेन के उग्र शानित्वादियो की सस्था, बडे पादरी शौपड ने,अकटूबर १६३४ मे, इसकी स्थापना की इस सस्था मे प्रसिध्द ल्र्ख्क तथा राज्नीतिक शामिल है, जैसे जाज लेन्सवरी,ला