पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/४३३

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४२८ हिटलर ने उनसे आर्थिक सहायता प्राप्त की। १६३० के चुनाव में हिटलर के दल को खूब सफलता मिली : १०६ नात्सी उम्मीदवार कामयाब हुए । हिटलर ने इस चुनाव मे विशेष रूप से चार बातो के अाधार पर अपना प्रचार किया ः (१) वर्साई की संधि की कटुता, (२) यहूदियो की अवाच्छनीयता, (३) प्रजा- तन्त्र-प्रणाली की पुष्टि, और (४) माक्सवाद का विरोध । जर्मन पार्लमेंट में अब नात्सी तथा साम्यवादी दो बडे दल थे । इन्होंने पार्लमेटरी प्रणाली के अनुसार शासन सचालन असम्भव कर दिया। दूसरी ओर बूढे राष्ट्रपति हिन्डन- वर्ग के हिमायतियो में सेना-नायकों और जमींदारो का गुट था, जिसने जर्मनी मे वस्तुतः अपना अधिनायक-तंत्र कायम कर रखा था । बढते हुए पार्थिक सकट के कारण जर्मन-जनता की जैसे-जैसे शोचनीय अवस्था होती गई तैसे-तैसे उग्र विचार-धारा के प्रति उन्हे अाशका हुई, हिटलर का दल बढता गया और चुनावों में विजय पर विजय प्राप्त करता गया । १० अप्रैल १६३२ को, जब हिटलर हिन्डनवर्ग के मुकाबले मे, राष्ट्रपति पद के चुनाव में खडा हुआ तो उसे १ करोड ३४ लाख मत और, ३१ जुलाई १६३२ को राइख- ताग की सदस्यता के चुनाव मे, १ करोड ३७ लाख मत मिले । फिर भी, हिन्डनबर्ग को पौने दो करोड़ मत मिले थे, और वह राष्ट्रपति रहा, और उसने हिटलर का चान्सलर बनाये जाने का मतालबा अस्वीकार कर दिया। ६ नवम्बर १६३२ के चुनाव में नात्सी-मत पहली बार कम हुए, इस चुनाव में हिटलर को कुल १ करोड १७ लाख मत प्राप्त हुए। इससे हिटलर की कलाभग होती दिखाई देने लगी। इसी समय जनरल फ़ान श्लेशर, जिसका जर्मनी मे उस समय बड़ा प्रभाव था, हिटलर के अान्दोलन से अपनी स्थिति को शक्तिशाली बनाने के लिए षड्यत्र रच रहा था। उसे चान्सलर बनाया गया । हिन्डनबर्ग के निकट- वर्ती सत्ताधारी गुट और हिटलर दोनो का एक साथ निष्कासन करनेके विचारसे श्लेशरने शासन-उत्क्रान्ति की योजना बनाई। जनरल श्लेशर के गुट में फौलाद के कारखानेदार कोरे दिवालिए पूँजीपति भी शामिल थे। हिटलर ने इनको पहले ही आश्वासन दिया था। वह हिटलर की सरकार से आर्थिक सहायता की आशा कर रहे थे, अतः उन्होने हिटलर को बचाने और जनरल के बजाय उसे चा- न्सलर बनाने का निश्चय किया । यह लोग समझते थे कि जनरल अपने अन्तर