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आतंकवाद
 


गया। छूटते ही आप गान्धीजी के साथ काग्रेस में शामिल होगये। १९२०-२१ के असहयोग-आन्दोलन में आपने महात्मा गान्धी के साथ विशेष भाग लिया। सन् १९२३ में देहली में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के सभापति हुए। सन

१९३० में कांग्रेस के स्थानापन्न सभापति रहे। सन् १९३० तथा सन् १९३२ के भद्र-अवज्ञा आन्दोलन में भाग लिया और कैद रहे। सन् १९३७ से सन १९३९ तक्र काग्रेस-पार्लमेण्टरी-कमिटी के सदस्य रहे। इसके बाद काग्रेस के रामगढ-अधिवेशन (मार्च १९४०) के अध्यक्ष निर्वाचित किये गये। अक्टूबर १९४० में महात्मा गान्धी ने युद्ध-विरोधी सत्याग्रह प्रारम्भ किया। इस समय प्रयाग में दिये गये एक भाषण के

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कारण आप गिरफ़्तार कर लिये गये। मौलाना काग्रेस के बहुत प्रभावशाली, सुयोग्य और लोकप्रिय तथा पुरातन नेता हैं। आप उच्च कोटि के वक्ता, लेखक तथा पत्रकार हैं। आपने क़ुरान की उर्दू मे महत्वपूर्ण टीका लिखी है। महात्मा गान्धी के आप दाहिने हाथ हैं। प्रत्येक मुस्लिम-प्रश्न का महात्माजी मौलाना साहब की सलाह से निर्णय करते हैं। मौलाना साहब की गान्धीजी मे अटल श्रद्धा है। वह पक्के गान्धीवादी नेता हैं। आपकी एक-निष्ठता आदर्श है।


आतंकवाद–राजनीतिक हत्याओ, डकैतियों तथा षड्यत्रो द्वारा सरकार तथा सरकारी अफसरो को सत्ताहीन कर देने का प्रयत्न करना। अराजकतावाद के सिद्धान्त को ठीक-ठीक रूप में न समझने के कारण कुछ अराजकतावादियों ने इस प्रकार के कार्यों को सगठित ढंग से करना आरम्भ किया। जब संगठित प्रयत्न दबा दिया गया तो व्यक्तिगत रूप से ऐसे कार्य किये जाने लगे। किंतु जहाँ अराजकतावाद एक सिद्धान्त है वहाँ आतङ्कवाद एक ऐसा मुहावरा है जिसकी विजित और विजेता अथवा शासित और शासक जातियो द्वारा, अपने-अपने विचारानुसार, पृथक् परिभाषा की जाती