पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/४४२

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हिन्दुस्तानी-तालीमी संघ ४३७ मालिक, बावू-पडित, दाकिम-अ्ली सभी दिनरात बोलते र समझतं हैं । हिन्दुस्तानी तालीमी संघ-महात्मा गावी की प्रेरणा से, २३ ्क्टूबर १६३७ को, वर्धा में, एक शिक्षा-परिपद् क्ा किया गया, जिसमें भारत भर के दामौ शिक्षा-विशारदों ने भाग लिया । इस परिपद् में महात्माजी ने देश की वर्तमान शिक्षा में मुधार के लिये यो जना प्रस्तुत की | उनकी योजना का साराश यह हे : ( १) शिन्षण-शालाता तथा विद्यालयी का स्वाव- लम्बी बनाया जाय, थथात् उनके सचालको का वाहरी क-सहायता के आत्रित न रहना पडे । ( २ ) शिक्षा का माध्यम बालका की मातृभापा हा, अगरेजी नहीं। प्रत्येक विद्यार्थी को दिन्दुस्त ानी श्रावश्यक हे। ( ३ ) शिक्षा पुस्तकीय न दीाकर शमें ्यावहारिक दोनी वाहिए। इसके लिये यह वश्यक है कि किसी एक रनचनात्मक उद्यांग के ग्राधार पर शिक्षा दीजाय | भदात्माजी की इस योजना पर विचार करके, नवीन शिक्षा-याजना के आधार पर पाठय-क्रभ तय्यार करने र लिये, शिक्षा-पारेपद ने जामिया मिल्लिया के अचाद दा० जाकिर हुनन की ग्रध्यन्षता में एक उपसमिति নियु की । इस सभिति ने अपनी रिपाट मे वि्याथियों के लिये ७ वर्ष का पाठय ुभ निदधास्ति ।या ह । साक्षा का ार एक उरग रता गना है, जन-( १ ) मृत क बुनना. ( २ ) दपि, ( ३ ) यटई का सान, ( ४) फ्न तभा मागसव्ी दी बादी, !) म का काम + रेपोर्ट का जान प्रापत करना भी म ।न। रा शिवषा देने पर र दिया गया है | मेंद्रान्ति क रे ए माधा 1. न, १.न, म्ानि ১नर न,: श २. २म :