पृष्ठ:Antarrashtriya Gyankosh.pdf/४५८

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आजाद
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अपनी राष्ट्रीय स्वाधीनता के संघर्ष में संलग्न है। वर्तमान युद्ध के प्रारम्भ होने पर अाशा की गई थी कि उन्ही उद्देशो और आदर्शों के आधार पर, जिनके सरक्षण के लिये मित्र राष्ट्र आज जूझ रहे हैं, भारत को स्वतन्त्रता प्रदान कीजायगी और वह एक स्वाधीन देश की भॉति विश्वव्यापी सघर्ष मे भाग लेसकेगा। ___"मेरी यह दृढ़ धारणा है कि भारत को स्वाधीन होने का पूर्ण अधिकार है और भारत की जनता को ऐसी अवस्थाअो मे रहना चाहिये, जिनमें कि वह शान्ति और सहयोग से रह सके । ब्रिटिश सरकार के कार्य और घोषणा से यह स्पष्ट होगया है कि वह भारतीय दलों और सम्प्रदायो को अपने मतभेदो को दूर करने मे सहयोग देने और देश की जनता के हाथो मे सत्ता सौंप देने और उन्हे स्वतत्र वातावरण मे सुखपूर्वक जीवन बिताने का अवसर देने तथा अपने जन्म-सिद्ध अधिकार के अनुसार अपने देश के भाग्य का निर्माण करने देने के बजाय ब्रिटिश सरकार की नीति भारत मे अपना साम्राज्यवादी याधिपत्य कायम रखने और उसे पराधीनता की वेडियो मे जकडे रखने और देश के राजनीतिक तथा साम्प्रदायिक मतभेद को प्रचार का साधन बनाकर उससे लाभ उठाने की रही है। वह राष्ट्रीय शक्तियों को, अपने साम्राज्यवादी उद्देश्यो तथा मन्तव्यो की पूर्ति के लिए, कुचल देना चाहती है।" __अपने पत्र में मि० अल्लाहबादश ने चर्चिल और ऐमरी की घोपणायो एवं वक्तव्यो की आलोचना भी की । इसी कारण, वाइसराय के आदेश से सिंच के गवर्नर ने, जनता की प्रतिनिधि व्यवस्थापक परिषद् के प्रति उत्तरदायी प्रधानमंत्री श्री मुहम्मदउमर अल्लाहबख्श को नवम्बर ४२ के दूसरे सप्ताह में अपने पद से बरखास्त कर दिया। भारत में ही नही समूचे ब्रिटिश साम्राज्य में मम्भवतः यद सबसे पहला उदाहरण है जब जनता के प्रति उत्तरदायी प्रधान मंत्री को, केवल अपने विचार-स्वातन्त्र्य के कारण, इस प्रकार पद-च्युन किया गया हो। नाज़ाद, मौलाना अबुलकलाम-'भारत छोडो' प्रस्ताव को स्वीकृति के बाद, ६ अगन्त १९४२ के प्रात काल, अन्य नेताग्री सहित अापको नी पर लिया गया। प्रप्रेल १९४३ मे आपकी येगम साहवा का देहान्त होगया। धर्मपती कोरुग्णावस्था ने और उनगी मृत्यु के बाद मोलाना सादर को रान