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क्रिप्स के प्रस्ताव
 

( १ ) युद्ध की समाप्ति पर भारत मे अग्र-लिखित ढग से एक निर्वाचित संस्था स्थापित की जायगी, जिसका कार्य भारत के लिए नये शासन-विधान का निर्माण करना होगा।

( २ ) विधान निर्माण करनेवाली परिषद् मे देशी रियासतों के प्रतिनिधित्व की भी निम्नलिखित ढंग से व्यवस्था की जायगी।

( ३ ) सम्राट् की सरकार यह स्वीकार करती है कि वह इस प्रकार बनाए गए विधान को स्वीकार कर लेगी तथा उसे लागू करने का प्रबंध करेगी। परन्तु नीचे लिखी शर्तों की पूर्ति आवश्यक होगीः---

( क ) ब्रिटिश भारत के किसी भी प्रान्त को, जो नये विधान को स्वीकार करने के लिए तैयार न होगा, अपनी वर्तमान वैधानिक स्थिति को क़ायम रखने का अधिकार होगा। यदि भविष्य में वह शामिल होना चाहेगा तो इसके लिए भी विधान में उल्लेख किया जायगा।

यदि भारतीय संघ (इडियन यूनियन) में शामिल न होनेवाले प्रान्त यह चाहेगे, तो ब्रिटिश सरकार उन्हें नया शासन-विधान बनाने की सुविधा देगी और उनकी स्थिति भी वैसी ही होगी जैसी कि भारतीय सघ की।

( ख ) जो संधि ब्रिटिश सरकार तथा विधान निर्माण करनेवाली परिषद् के बीच होगी, उस पर हस्ताक्षर किये जायॅगे। इस संधि-पत्र में वे सब बाते रहेगी जो ब्रिटिश सरकार से भारतीयो को पूर्ण उत्तरदायित्व हस्तान्तरित करने पर पैदा होगी। इसमे जातीय (racial) तथा धार्मिक (religious) अल्पमतो की रक्षा के लिए विधान होगा। परन्तु इस संधि द्वारा भारतीय संघ की उस सत्ता पर कोई प्रतिबन्ध न लगाया जायगा जिससे वह भविष्य में ब्रिटिश राज्य-समूह (ब्रिटिश कामनवैल्थ) के दूसरे राज्यों के साथ, संबंधों के विषय मे, निर्णय करेगी।

चाहे देशी राज्य विधान को स्वीकार करना पसन्द करे अथवा न करे, नई परिस्थिति में सधियो की व्यवस्था में परिवर्तन करने पड़ेंगे।

( ४ ) विधान निर्माण करनेवाली परिषद् का संगठन इस प्रकार होगा, जबतक कि भारतीय लोकमत के नेता मिलकर, युद्ध समाप्ति से पूर्व, कोई दूसरा उपाय निश्चित न करले।