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गान्धी
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प्रायश्चित्तस्वरूप इक्कीस दिन का व्रत किया। देश दहल उठा और स्वर्गीय पं० मोतीलाल नेहरू के सभापतित्व मे एकता-सम्मेलन हुआ। ३१ दिसम्बर १९२९ की आधी रात को लाहौर में पूर्ण स्वाधीनता के ध्येय की घोषणा की गई। इसी वर्ष गान्धीजी के प्रभाव से लार्ड इरविन के प्रति, उनकी स्पेशल को उडाये जाने की घटना से उनके बच जाने के लिये, सहानुभूति का प्रस्ताव स्वीकार किया गया।

साइमन कमीशन की विफलता के बाद सन् १९३० में गांधीजी ने नमक सत्याग्रह आरम्भ किया। इस आन्दोलन में उन्हे राजबन्दी बनाकर यरवदा जेल में रखा गया। जनवरी १९३१ मे उन्हे मुक्त कर दिया गया। ३१ मार्च १९३१ को गांधीजी तथा भारत के वाइसराय लार्ड इरविन (अब लार्ड हैलीफैक्स) में समझौता हुआ। इस समझौते के अनुसार गांधीजी ने लन्दन की गोल-मेज़ परिषद् में कांग्रेस की ओर से शामिल होना स्वीकार किया तथा समस्त राजनीतिक बन्दी रिहा कर दिये गये और व्यक्तिगत रूप से नमक बनाने का सबको अधिकार मिल गया।

सन् १९३१ मे वह लन्दन गये और गोल-मेज़ परिषद् में भाग लिया। जब सन् १९३२ के जनवरी मास मे भारत वापस आये तो उन्हें फिर गिरफ़्तार किया गया। सितम्बर १९३२ में उन्होने यरवदा जेल में, साम्प्रदायिक निर्णय के विरुद्ध, आमरण उपवास रखा और पूना-पैक्ट के स्वीकार होजाने पर अपना व्रत भंग किया। सन् १९३३ में उन्होने सत्याग्रह आश्रम अहमदाबाद को भंग कर दिया। वर्धा (मध्यप्रदेश) मे सेठ जमनालाल की बजाजवाडी मे अपना निवास-स्थान बनाया। इसके बाद वर्धा से पॉच मील दूर सेवाग्राम में अपना आश्रम स्थापित किया।

देश-नेताओं की प्रवृत्ति फिर धारा-सभाओ मे जाने की हुई और चुनाव लड़ना तय हुआ, फलतः सत्याग्रह-आन्दोलन समाप्त कर दिया गया, और बम्बई की विशेष कांग्रेस (अक्टूबर १९३५) के बाद गांधीजी ने कांग्रेस की सदस्यता से त्यागपत्र देदिया। इसके बाद वे अछूतोद्धार, ग्राम-सुधार तथा ग्रामोद्योग संघ के कार्य में पूर्णतया लग गये। सन् १९३७ में जब प्रान्तीय चुनावों में ११ में से ७ प्रान्तो में कांग्रेस की विजय हुई तब, मार्च १९३७ में, देहली