धोवर-शुद्ध भी जमादी | इसका नतीजा दूसरा कुछ हो ही नही सकता था । ब्रिटिश साम्राज्य जैसा चक्रवत्त राज्य धमकीके सामने कब भुक सकता है ? 'अल्टिमेटम' की अवधि पूरी हुई और बोबर सेना विद्युद्वेगसे आगे बढ़ी। उसने लेडी स्मिथ, किवरली और मेकका घेरा डाल दिया। इस प्रकार १८९९ मे यह महायुद्ध आरभ हुआ । पाठक जानते ही है कि इस युद्धके कारणोमें यानी ब्रिटिश मागोमे बोअर राज्योंमे भारतीयोंकी परिस्थिति, और उनके साथ होनेवाला व्यवहार भी शामिल था । मेय इस अवसरपर दक्षिण अफ्रीकाके भारतीयोंका कर्तव्य क्या है, यह महत्वपूर्ण प्रश्न उनके सामने उपस्थित हुआ । बोबर लोगों से तो सारा पुरुषवर्ग लडाईपर चला गया । वकीलोंने वकालत छोडी, किसानोने अपने खेत छोड़े, व्यापा- रियोने अपनी कोठियो दुकानोपर ताले डाल दिए, नौकरी करनेवालोने नौकरी छोड़ी । अग्रेजोंकी तरफसे वोअरोके बराबर तो नहीं, फिर भी केप कॉलोनी, नेटाल गौर रोडेशियामे असैनिक वर्गके बहुसख्यक लोग स्वयसेवक बने । बहुतसे बड़े अंग्रेज afiat atर व्यापारियोने उनमे नाम लिखाया । जिस अदालत में में वकालत करता था उसमे भी अब वहुत ही थोड़े वकील दिखाई दिये । वड़े वकीलोमेसे तो अधिकाश लड़ाईके काममे लग गये थे। हिन्दुस्तानियों पर जो तुहमते लगाई जाती है उनमेसे एक यह है, "ये लोग दक्षिण अफ्रीकामे केवल पंसा कमाने और जोड़नेके लिए आते है। हम (अग्रेजो) पर वे निदे भार रूप है और जैसे कीडा काठके भीतर बसकर उसको कूदकर खोखला कर देता है वैसे ही ये लोग हमारा कलेजा कुरंदकर खा जानेके लिए ही जाये है। इस देशपर हमला हो, हमारा घरवार लुट जानेका वक्त आजाय तो ये हमारे कुछ भी काम आनेवाले नही । हमे लटेरोसे अपना ही बचाव नही करना होगा, इन लोगोकी रक्षा भी करनी होगी ।"
पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/१००
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