बोर-युद्ध Y ६६ गिरमिटियों को भी इसमें शामिल कर लेना वांछनीय है । इस वक्त तो सरकारको जितने भी आदमी मिल सके उतने दरकार थे। इससे सब कोठियोमे भी निमत्रण भेजे गये । फलत. लगभग ११०० भारतीयोंका शानदार विशाल दस्ता डर्बनसे रवाना हुआ। उसके प्रस्थान के समय श्री एस्कंबने, जिनके नामसे पाठक परिचित ही है और जो नेटालके गोरे स्वयं- सेवको के महानायक थे, हमे धन्यवाद और आशीर्वाद दिया । 1 अग्रेजी असवारोंको यह सव चमत्कार-सा लगा। हिंदु- स्तानी युद्धमे कुछ भी मदद देगे इसकी उन्हे आशा ही नहीं थी । एक अग्रेजने अपने एक प्रमुख पत्रमे एक स्तुतिकाव्य लिखा, जिसके टेककी पक्तिका अर्थ यह है, "अन्ततः हम सभी एक ही साम्राज्यके बच्चे है ।" इस दस्तेमे ३०० से ४०० तक गिरमिट मुक्त हिदुस्तानी थे जो स्वतंत्र भारतीयों की कोशिणसे इकट्ठा हुए थे। इनमेसे ३७ मुखिया माने जाते थे । इन्ही लोगों के हस्ताक्षरसे सरकारके पास प्रस्ताव भेजा गया था और दूसरोको इकट्ठा करनेवाले भी यही थे। नेताओ मे बेरिस्टर, क्लर्क, मुनीम बादि थे। बाकी लोगों ने कारीगर, राज, बढ़ई और मामूली मजदूर वगैरह थे। इनमें हिंदू, मुसलमान, मद्रासी, उत्तर भारत वाले इस प्रकार सभी वर्गीके लोग थे । व्यापारी वर्गमेंसे, कह सकते है कि एक भी आदमी नही था; पर व्यापारियों- ने अपना हिस्सा पैसेके रुपये दिया और काफी दिया । इतने बड़े वस्ते को जो फोनी मत्ता मिलता है उसके अति- रिक्त दूसरी जरूरते भी होती है और वे पूरी हो जाय तो इस कठिन जीवनमे कुछ राहत मिल जाती है। ऐसी राहत देने- । की चीजे जुटाने का भार व्यापारी वर्गने अपने सिर लिया । इसके साथ-साथ जिन घायलोकी हमे सेवा करनी पडती थी उनके लिए भी मिठाई, बीड़ी-सिगरेट आदि देनेमें
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