१०० दक्षिण फ्रोकाका सत्याग्रह उन्होंने अच्छी मदद की। हमारा पडाव जब किसी नगरके पास होता तो वहाके व्यापारी ऐसी मदद देनेमे पूरा हिस्सा लेते थे । जो गिरमिटिए हमारे दस्तेमे शामिल हुए थे उनके लिए उनकी अपनी कोठियोसे अग्रेज नायक भेजे गए थे; पर काम तो सबका एक ही था । सबको साथ ही रहना भी होता था । ये गिरमिटिए हमे देखकर बहुत खुश हुए और एक पूरे दस्तेकी व्यवस्था सहज ही हमारे हाथमें आ गई । इससे यह सारा दस्ता हिदुस्तानी दस्ता ही कहा गया और उसके कामका यश भी भारतीय जनताको ही मिला । सब पूछिये तो गिरमिटियोके इसमे शामिल होनेका यण भारतीय जनता नही ले सकती थी, उसके अधिकारी तो कोठीवाले ही थे । पर इतना सही है कि दस्ते सगठित हो जानेके वाद उसकी सुव्यवस्थाका यश स्वतंत्र भारतीय अर्थात् भारतीय जनता ही ले सकती थी और इसका स्वीकार जनरल वूलरने अपने खरीतोमे किया ह | हमें घायलो और पीडितोकी सेवा-शुश्रूषाकी शिक्षा देने- वाले डाक्टर बूथ भी मेडिकल सुपरिंटेंडेंटके रूपमें हमारे दस्तेके साथ थे । ये भले पादरी थे और भारतीय ईसाइयोमें काम करते हुए भी सबके साथ मिलते-जुलते थे । ऊपर जिन ३७ आदमियोको मैने नेताओमे गिनाया है उनमें से अधिकाश इस भले पादरीके शिष्य थे । जैसे हिंदुस्तानियो का दस्ता बना था वैसे ही यूरोपियनोका भी बनाया गया था। दोनोको एक ही जगह काम भी करना होता था । हमारा प्रस्ताव विना शर्त के था । पर स्वीकार-पत्रमें यह जता दिया गया था कि हमे तोप या बदूककी मारकी हृदमें जाकर काम नहीं करना होगा । इसके मानी यह होते थे कि
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