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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/११

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( ४ ) मे-"मेरे लिए तो जेल ही काफी है; पर देखना, विश्वासघात न हो !" मोतीलाल - "यह तो काम पउनेपर मालूम होगा ।" I मं राजकोट पहुचा । वहा अविक ब्योरे मालूम किये और सरकार के साथ लिखा-पढी शुरू कर दी । वगमरा' श्रादिके भारगोमं मेने लोगोका सलाह दी कि वीरमगामकी चुगीके मामलेमे सत्याग्रह करना पडे तो वे उसके लिए तैयार रहे। सरकारकी वफादार खुफिया पुलिसने ये भाषण उसके दफ्तर मे पहुचाए। पहुचानेवालेने सरकारके साथ अनजानम जनताकी भी सेवा की। मतमे लाई चेम्सफर्ड के साथ इस विषयमें बातचीत हुई और उन्होने दिए हुए बचनका पालन किया । श्ररीने भी कोशिश की, यह में जानता हू । पर मेरी पक्की राय है कि इस मामले को लेकर सत्याग्रह किये जानेकी सभावना थी, इसीसे यह बुगी रद्द हुई । वीरमगामके बाद गिरमिटके कानूनसे लडना पडा। इस कानूनको रद्द कराने के लिए भरपूर कोशिश की गई थी। इस लढाईको जोर पहु- चानके लिए सार्वजनिक प्रादोलन भी अच्छा-खासा हुआ था । बम्बईमे हुई सभा में गिरमिट यानी शबद कुलीप्रभाको बद करानेके लिए १६१७ की ३१ वी जुलाईकी तारीख ते की गई थी। यह तिथि कैसे नियत हुई इसका इतिहास यहा नही दिया जा सकता । इस आदोलनके अतर्गत वाइसरायके पास पहले बहनोका प्रतिनिधिमंडल गया । इसमे खास कोशिश किसकी थी यह लिखे बिना नही रहा जा सकता । वह थी चिरस्मरणीय बहन जाइजी पेटिटकी । इस लड़ाईमे केवल सत्याग्रहकी तैयारीसे ही हमारी विजय हो गई । पर उसके विषयमें सार्वजनिक आदोलनकी आवश्यकता थी, यह यतर याद रखने लायक है। गिरमिटको बद कराना वीरमगामकी चुगी उठवानेसे ज्यादा वजनदार मामला था । 'काठियावाड़का एक स्थान ।