१०५ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह भयका कारण हो गया । परवाने देनेके दफ्तर दक्षिण अफ्रीका- जुदा-जुदा वदरगाहो मे खोले गये थे । गोरेको तो कह सकते हैं कि मांगते ही परवाना मिल जाता था, पर हिंदु- स्तानियो के लिए तो ट्रांसवालमे एक एशियाटिक विभाग स्थापित किया गया था। यह अलग महकमेकी स्थापना एक नयी घटना थी । हिदुस्तानियो को इस महकमे के अफसर के पास अर्जी भेजनी होती । वह मजूर हो गई तो डर्बन या किसी दूसरे बदर- गाहसे आमतौर परवाना मिल जाता था । यह अर्जी मुझे भी देनी होती तो मि० चेबरलेनके ट्रांसवालसे चल देनेके पहले परवाना मिलने की आशा नही रखी जा सकती थी । ट्रांसवालके भारतीय वैसा परवाना प्राप्त कर मुझे नहीं भेज सके थे । यह बात उनके बसके बाहर थी । मेरे परवानेका आधार उन्होने डर्बनसे मेरे परिचय, मेरे सबधका बनाया था । परवाना देनेवाले अफसर से मेरी जान-पहचान नही थी, पर उनके पुलिस सुपरिटेडेटसे थी। इसलिए उन्हें साथ लेजाकर अपनी पहचान दिला दी । १८९३ मे में एक सालतक ट्रासवालमे रह चुका हू, यह अधिकार बताकर मैने परवाना हासिल किया और प्रिटोरिया पहुचा । यहां मैने बिलकुल दूसरा ही वातावरण पाया । मैने देखा कि एशियाटिक विभाग एक भयानक महकमा है और महज हिंदुस्तानियो को दबाने के लिए कायम किया गया है। उसके अफसर उन लोगोमेसे थे जो युद्धकालमे हिंदुस्तानी सेनाके साथ दक्षिण अफ्रीका गए थे गोर भाग्यपरीक्षाके लिए वहा रह गए थे । उनमेसे कितने तो घूसखोर थे। दो अफ सरोपर मुकदमा भी चला। जूरीने तो उन्हें छोड़ दिया, पर चूकि उनके घूस खानेके वारे कोई सदेह नहीं रह गया था, इसलिए वे नौकरीसे अलग कर दिये गए । पक्षपातकी
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