लड़ाईके बाद १०६ तो कोई हद ही न थी, जहा इस तौरपर एक खास महकमा कायम किया गया हो और जब वर्ग-विशेषके स्वत्वोपर अकश रखनेके लिए ही उसका निर्माण हुआ हो तब अपनी हस्ती कायम रखनेके लिए और वह अपने कर्तव्यका पालन ठीक तोरसे कर रहा है यह दिखाने के लिए उसका झुकाव नए-नए अंकुश ढूंढते रहनेकी ओर ही होता है। हुआ भी यही । मेने देखा कि मुझे फिरसे श्रीगणेश करना होगा। एशियाटिक महकमेको तुरंत इसका पता नही लग सका कि में ट्रांसवालमे कैसे दाखिल हो गया। मुझसे पूछनेकी तो यकायक उसकी हिम्मत हुई नही। में मानता है कि उसके अधिकारियो ने इतना तो माना होगा कि में चोरीसे नही दाfae gar gगा | इधर-उधरसे पूछताछ कर उन्होंने यह भी मालूम कर लिया कि मैने परवाना कैसे हासिल कर लिया । प्रिटोरियाer fशष्ट-ause भी मि० चेबरलनके पास जानेको तैयार हमा। जो आवेदनपत्र उनके सामने पेश किया जानेवाला था उसका मसविदा मैने बना दिया । पर एशियाटिक महकमेने मुझे उनके सामने जानेकी मनाही कर दी। भारतीय नेताओंने सोचा कि ऐसी दशामे हमें भी मि० चैवरलेनसे मिलने नही जाना चाहिए; पर मुझे यह विचार नही रुचा । मैने उन्हें यह सलाह दी कि मेरा जो अपमान हुआ है उसे मुझे तो पी ही जाना चाहिए, कोमको भी उसकी परवा नहीं करनी चाहिए । अर्जी तो तैयार है हो, मि० चेवरलेनको उसे सुना देना बहुत जरूरी है । हिंदुस्तानके एक वैरिस्टर मि० जाजं गाडफे वहां मौजूद थे। मैने उन्हें अर्जी पढ़ देनेके लिए तैयार कर लिया। शिष्ट-मण्डल गया । मेरी बात उठी तो मि० वेबरलेनने कहा "मि० गाधीसे तो मे डनमें मिल चुका है । इसलिए यह सोचकर कि यहा के लोगोका वृत्तांत यहीके लोगोसे सुनना ज्यादा अच्छा
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