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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/१२३

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११६ दक्षिण श्रीकाका सत्याग्रह बुद्धिमानी की राजनीति यही मानी जाती है कि एकदेशीय- वर्ग या जाति विशेषपर ही लागू होनेवाले कानून कम-से-कम बनाये जाय। विलकुल ही न बनाना तो सर्वोत्कृष्ट नीति है । कोई कानून जब एक बार बन गया तो उसे बदलने में अनेक कठिनाइयां आती है। लोकमत जब बहुत शिक्षित समझदार हो जाय तभी कोई कानून रद किया जा सकता है । जिस लोकतत्रमें सदा कानूनों में रद्दोबदल होती रहती है वह लोकतंत्र सुव्यवस्थित नही माना जा सकता । । ट्रांसवालमे एजियाइयो के खिलाफ जो कानून बने थे उनमें भरे हुए जहरका अन्दाजा अब हम अधिक अच्छी तरह कर सकते हैं। ये सारे कानून एकदेशीय थे। इनके अनुसार एशियावासी चुनाव मे मत नही दे सकता था | सरकारने जो रकबे या महल्ले ठहरा दिये थे उनके बाहर न जमीन खरीद सकता था और न रख सकता था । इन कानूनो के रद हुए विना अधिकारी वर्ग हिदुस्तानियो की मदद कर ही नही सकता था। ये कानून सार्वजनिक नहीं थे। इसीसे लार्ड मिल्नरकी कमेटी उन्हें अलग छांट सकी थी। वे सार्वजनिक होते तो दूसरे कानूनो के साथ वे सब कानून भी रद हो गये होते, जिनमे एशियाइयोंका नाम तो खासतौरसे नही लिया गया है, पर जिनका अमल उन्ही के खिलाफ होता था । अधिकारीवर्ग यह तो कह ही नही सकता था - "हम क्या कर सकते है ? हम लाचार है। जबतक नई धारा सभा इन कानूनों को रद नहीं कर देती तबतक हमे तो उनको अमलमे लाना ही होगा ।" जब ये कानून एशियाटिक महकमेके हाथमें आये तो उसने उनपर पूरे तोरसे अमल करना शुरू किया। इतना ही नहीं, शासक मंडल अगर उन कानूनोको अमल करने योग्य माने तो उनमे जो त्रुटियां छूट गई हो, बचावके रास्ते रह गये