लड़ाईके बाद स्वभावकी है। इससे उसे यह डर रहता है कि पूर्वकी सभ्यताके हजारो प्रतिनिधि दक्षिण अफ्रीकामे बस गये तो पश्चिमके लोगोका पछाड़ा जाना निश्चित ही है। इस आत्मघात के लिए दक्षिण अफ्रीकामे वसनेवाली पश्चिमकी जनता हर्गिज तैयार नहीं हो सकती और इस जनताके हिमायती उसे इस खतरेमे कभी नही पढ़ने देगे ।" मं समझता हू, मले-से-भले और चरित्रवान् यूरो- पियन इस वलीलको जिस शक्लमें पेश करते हे मैने उसी रूपमे निष्पक्षभावसे यहां उसे उपस्थित किया है । में ऊपर इस दलीलको तत्त्वज्ञानका ढोग बता आया हू; पर इससे में यह सूचित करना नहीं चाहता कि इस दलीलमे कुछ भी सार नही है । व्यावहारिक दृष्टि, अर्थात् तात्कालिक स्वार्थ- दृष्टिसे तो उसमे बहुत कुछ सार है, पर तात्विक दृष्टिसे वह निरा ढोग है। मेरी छोटीसी मक्लको तो यही दिखाई देता है कि तटस्थ मनुष्यकी बुद्धि ऐसे निर्णयको स्वीकार नही कर सकती। कोई सुधारक अपनी सभ्यताको वैसी असहाय स्थितिमे नही डालेगा जैसी स्थितिमें ऊपरकी दलीले देनेवालोंने अपनी सभ्यताको डाल दिया है। पूर्वके किसी तत्त्वज्ञानीको यह भय होता हो कि पश्चिमकी जनता पर्वके साथ आजादीसे मिले-जुले तो पूर्वकी सभ्यता पश्चिमकी बाढमे बालकी तरह वह जायगी । "यह में नही जानता । पूर्वके तत्त्वज्ञानको जहाँतक में समझ पाया हू, मुझे तो यही दिखाई देता है कि पूर्वकी सभ्यता पश्चिमके स्वतंत्र सगमसे निर्भय रहती है। यही नही, वैसे सम्पर्कका स्वागत करती है। इसकी उलटी मिसाले पूर्वमे दिखाई दे तो जिस सिद्धांतका प्रतिपादन मैने किया है उसको इससे मांच नही आती, क्योंकि में मानता हूं कि इस सिद्धांतके समर्थनमे अनेक दृष्टान्त दिये जा सकते है। कुछ भी हो, पश्चिमके तत्त्वज्ञानियोंका दावा तो यह है कि
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