१२० दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह पश्चिमको सभ्यताका मूल सिद्धांत यही है कि पशुवल सर्वो- परि है और इसी से इस सभ्यता के हिमायती पशुबलके रक्षणमे अपने समयका अधिक-से-अधिक भाग लगाते है । उनका तो यह भी सिद्धात है कि जो राष्ट्र अपनी आवश्यकताए नही वढाता उसका अतमे नाश होना निश्चित है। इसी सिद्धात- का अनुसरण करके तो पश्चिमकी जातिया दक्षिण अफ्रीका मे बसी है और अपनी सख्याको तुलनामे सैकडो गुना बडी तादादवाले हबशियोको अपने वशमे कर लिया है। उन्हे हिंदुस्तानको रक जनताका भय हो ही कैसे सकता है ? इस सभ्यताको दृष्टिसे वस्तुतः उन्हे कुछ भी भय नही है, इसका सबसे वडा सबूत तो यह है कि हिंदुस्तानी अगर सदा के लिए दक्षिण अफ्रीकामे मजदूर बनकर ही रहते तो उनके बसने के विरुद्ध कोई आन्दोलन उठा ही नहीं होता । अत. जो चीज बाकी रह जाती है वह है केवल व्यापार और वर्ण । हजारों यूरोपियनोने लिखा और कबूल किया है कि हिंदुस्तानियो का व्यापार छोटे अग्रेज व्यापारियो के लिए हानिकर है और गेहुए रगसे नफरत तो फिलहाल गोरे चमडे - वाली जातियोंकी हड्डी-हड्डी मे व्याप्त हो गई है । उत्तरी अमरीका कानून सबका बराबर हक है, पर वहां भी बुकरटी वाशिंगटन जैसा पुरुष, जिसने कवी-से-ऊची पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त की थी, जो अतिशय चरित्रवान और ईसाई धर्मको भाननेवाला था और जिसने पश्चिमको सभ्यताको पूरे तौरपर अपना लिया था, राष्ट्रपति रूजवेल्टके दरबारमे न जा सका और न आज तक जा सकता है। वहाँ के हबशियोने पश्चिमी सभ्यताको स्वीकार कर लिया है । वे ईसाई भी बन गये है; पर उनका काला चमडा उनका अपराध है और उत्तरी अमरीकामे अगर लोक व्यवहारमे उनका तिर स्कार किया जाता है तो दक्षिण अमरीश अपराधके सदेह-
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