लड़ाईके बाद १२१ मात्रसे गोरे उन्हें जिंदा जला देते हैं। दक्षिण अमरीकामें इस दडनीतिका एक खास नाम भी है जो आज अंग्रेजी भाषाका प्रचलित शब्द हो गया है। वह है 'लिचला। लिच-ला के मानी उस दंडनीति है जिसके अनुसार पहले सजा दी जाती है, पीछे अपराधका विचार किया जाता है । यह प्रया for नामके व्यक्तिसे चली है । अतः उसीके नाम पर इसका नामकरण हुआ है । इस विवेचनसे पाठक देख सकते हैं कि ऊपर दी हुई तात्विक मानी जानेवाली दलीलमे अधिक तत्व या सार नहीं है। पर वे यह अर्थ भी न करें कि यह दलील देनेवाले सभी लोग उसे झूठी जानते हुए भी पेश करते हैं । उनमेंसे बहुतेरे सचाइके साथ मानते है कि उनकी दलील तात्त्विक है। हो सकता है कि हम वैसी स्थितिमे हों तो हम भी वैसी ही दलील पेश करे। कुछ ऐसे ही कारणोंसे 'बुद्धि. कर्मानुसारिणी' कहावत निकली होगी। इसका अनुभव किसको नहीं हमा होगा कि हमारी अन्तर्वृत्ति जैसी बनी हो वैसी ही दलीले हमें सूझा करती है और वे दूसरे के गले न उतरे तो हमें असन्तोष, अधीरता और अन्तमे रोष भी होता है। इतनी बारीकीमे में जानबूझकर गया हूँ। में चाहता कि पाठक भिन्न-भिन्न दृष्टियोको समझें और जो अबतक वैसा न करते आये हों वे भिन्न-भिन्न दृष्टियोको समझने और उनका आदर करनेकी आदत डालें । सत्याग्रहका रहस्य समझने और खासकर इस अस्त्रको बाजमानेके लिए ऐसी उदारता और ऐसी सहनशक्तिको अति आवश्यकता है । इसके बिना सत्याग्रह हो ही नही सकता । यह पुस्तक कुछ लिखने के शौकसे तो लिखी नहीं जा रही है । दक्षिण अफ्रीका- के इतिहासका एक प्रकरण जनताके आगे रखना भी उसका उद्देश्य नही। मेरा हेतु तो यह है कि जिस वस्तु के लिए में जीता
पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/१२८
दिखावट