लड़ाईके बाव १२३ बालमे अग्रेजी राज्य कायम होनेके बाद हिंदुस्तानियो के लिए जो परवाने निकाले गए थे उनमें उनके हस्ताक्षर और जो • हस्ताक्षर न कर सके तो उनके अंगूठे की निशानी ली जाती थी। पीछे किसी अधिकारीने सुझाया कि उनका फोटो भी ले लिया जाय । नों फोटो, अगठेकी निशानी और दस्तखत तीनों लिए जाने लगे। इसके लिए किसी कानून कायदेकी जरूरत तो थी नही, अत. नेताओं को तुरंत इसकी खबर भी नही हो सकी । धीरे-धीरे उन्हे इन नवीनताओकी खबर हुई। जनताकी ओरम अधिकारियो के पास आवेदनपत्र भेजे गए, शिष्ट-मण्डक भी भेजे गए। अधिकारियोकी दलील यह थी कि चाहे जो आदमी चाहे जिस रीतिसे इस देशमे दाखिल हो जाय, यह हमसे सहन नही हो सकता । अत सभी हिंदुस्तानियों के पास एक ही तरहका परवाना होना चाहिए और उसमे इतना ब्योरा होना चाहिए कि परवाना पानेवाल असल आदमी ही उसके जरिए इस देशमे दाखिल हो सके, दूसरा कोई नहीं। मैने यह सलाह दी कि गोकि कोई कानून तो ऐसा नही है जिसकी रूसे हम ऐसे परवाने रखनेको वर्ष हो, फिर भी जबतक शांति-रक्षा कानून मौजूद है तबतक ये लोग हमसे परवाना तो मांग ही सकते है। जैसे हिंदुस्तानमे भारतरक्षा कानून (डिफेस आव इडिया एक्ट था वैसे ही दक्षिण अफ्रीकामे शांति-रक्षा कानून (पीस प्रिजर्वेशन आडिनेस) था और जैसे हिंदुस्ता- नमें भारत-रक्षा कानून महज जनताको तग करनेके लिए ही लबी मुद्दततक कायम रखा गया वैसे ही यह शांति- रक्षा कानून भी महज हिंदुस्तानियों को हैरान करनेके लिए रख छोडा गया था । गोरोके ऊपर एक तरहसे उसका अमल बिलकुल ही नही होता था। अब अगर परवाना लेना ही हो तो उसमें पहचान की कोई निशानी तो होनी ही चाहिए। इसलिए जो लोग अपना नाम न लिख सकते हों उनका अंगूठे-
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