१२६ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह इरादा इस प्रतिष्ठाको बढानेका नही, बल्कि घटानेका था । उनको हिंदुस्तानियो की रजामंदी की जरूरत नही थी। वह तो चाहते थे उनपर बाहरी प्रतिबंध लगाकर उन्हे थर्रा देना । अत उन्होने एशियाटिक ऐक्टका मसविदा बनाया और सरकारको सलाह दी कि जबतक इस मसविदेके अनुसार कानून बनकर तैयार नहीं हो जाता तबतक हिंदुस्तानियो का लुक-छिपकर सवाल दाखिल होना रोका नही जा सकता और जो इस तरह यहा पहुच जाय उन्हें निकाल बाहर करनेकी प्रचलित कानूनोमे कोई व्यवस्था नहीं है। मि० कटिसकी दलीले और मसविदा सरकारको पसंद आया और उसने इस मसविदेके अनुरूप विल ट्रासवालकी धारा समामें पेश करनेके लिए दासवालके सरकारी गजटमे प्रकाशित कर दिया । इस विलकी तफसीलमे जानेके पहले एक महत्त्वकी घटना- की चर्चा थोडे शब्दोंमे कर देना आवश्यक है । सत्याग्रहकी प्रेरणा करनेवाला में ही हू । इसलिए यह बहुत जरूरी है कि पाठक मेरी स्थितियो को पूरी तरह समझले । यो जब ट्रांसवालमे हिदुस्तानियोपर प्रतिबंध लगानेके प्रयत्न हो रहे थे, नेटालमे वहा के हबशियो — जुलू लोगोने बगावत कर दी। इस झगडेको बगावत कह सकते है या नही, इस बारेमे मुझे गका थी और आज भी है। फिर भी नेटालमें इस घटनाका परिचय सदा इसी नामसे दिया गया है। इस मौकेपर भी नेटालमे रहनेवाले बहुतसे गोरे इस विप्लवको शात करने में सहायता देनेके लिए स्वयसेवकके रूपमे सेनामे भरती हुए। मैं भी नेटालका ही निवासी माना जाता था । इसलिए मैने सोचा कि मुझे भी उसमे काम करने चाहिए । भारतीय जनताकी अनुमति प्राप्तकर मैने सरकारको लिखा कि घायलो - की सेवा करनेवाली एक छोटी-सी टुकडी खडी करने की
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