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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/१३४

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भलमनसीका भवता-सूनी कानून १२७ इजाजत मुझे दे दी जाय । सरकारने प्रस्ताव स्वीकार किया । अतः मैंने ट्रांसवालका घर तोड़ दिया । वालवच्चोंको नेटाल- में उस खेतपर भेज दिया जहसि 'इंडियन गोपीनियन नामका साप्ताहिक अखबार निकाला जाता था और जहां मेरे सह- कारी रहते थे। दफ्तर कायम रखा, क्योंकि में जानता था कि मुझे इसमे बहुत दिन नहीं लगेंगे । २०-२५ आदमियोंकी छोटीसी टुकड़ी खड़ी करके में फौनमे शामिल हो गया। इस छोटी-सी टुकड़ीमें भी लगभग सभी जातियोंके भारतीय थे। इस टुकड़ीको एक महीने सेवा करनी पड़ी। हमें जो काम सौपा गया उसको मैंने सदा ईश्वर- का अनुग्रह माना है। मैंने देखा कि जो हवशी जस्मी होते थे उन्हें हम ही उठायें तो वे उठें, नही तो वही पड़े सड़ा करें । इन जल्मियोंके जख्मोंकी मरहम-पट्टी करनेमें कोई भी गोरा हाथ न मटाता । जिस शस्त्रवंद्य डा० संवेजकी मातहतीमें हमें काम करना था वह स्वयं अतिशय दयालु थे। घायलोंको उठाकर अस्पताल पहुंचा देनेके बाद उनकी सेवा-शुश्रूपा हमारे कार्य-क्षेत्रके बाहरकी बात हो जाती थी। पर हम तो यह सोच कर गए थे कि जो भी सेवा हमें सौंपी जाय वह हमारी कर्तव्य परिषिके अन्दर ही होगी । अतः इस भले डाक्टरने हमसे कहा कि मुझे कोई भी गोरा हवशियोंकी सेवा करनेके लिए नहीं मिलता और मुझमें यह शक्ति नही कि किसी को इसके लिए मजबूर कर सकूं। आप यह दयाका काम करें तो आप- का अहसान मानूंगा । हमने इस कामका स्वागत किया । कितने ही हवनियोंक जलम पांच-पांच छः-छः दिनसे साफतक नहीं किये गये थे, इससे उनसे दुर्गंध आ रही थी। इन सबको साफ करना हमारे सिर पड़ा और हमें यह सेवा बहुत रुची । हवंशी हमारे साथ बात तो कर ही नहीं सकते थे; पर उनकी चेष्टाओं और उनकी आंतोंमें हम यह देख सकते में कि उनका