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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/१३६

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मलमनसीका बला-सूनी कानून १२९ छोटीसी पहाड़ी थी। वहां अपने साथीको लेकर इस विलका उल्था 'इंडियन ओपीनियन के लिए करने लगा । ज्यों- ज्यों में उसकी धाराओंको पढ़ता गया त्यों-त्यों मेरा कलेजा अधिकाधिक कांपने लगा । उसमे में भारतीयोंके द्वेपके सिवा और कुछ भी नहीं देख सका। मुझे दिखाई दिया कि अगर यह बिल पास हो गया और भारतीयोने उसे मजूर कर लिया तो दक्षिण अफ्रीकासे उनके पैर जढ़मलसे उखड़ जायगे । मुझे स्पष्ट दिखाई दिया कि भारतीय जनताके लिए यह जीवन- मरणका प्रश्न है। मुझे यह भी दिखाई दिया कि मर्जी अब देने- से सफलता नही मिली तो वह चुप नही बैठ सकती। इस कानून- के सामने सिर झुकाने से मर मिटना बेहतर है । पर भरें कैसे ? भारतीय जनता किस खतरेमे कूदे या कूदनेका साहस करे कि उसके सामने विजय या मृत्यू इन दोके सिवा तीसरा रास्ता रह ही न जाय ? मेरे सामने तो ऐसी संगीन दीवार खड़ी हो गई कि मुझे रास्ता सूझा ही नहीं । जिस प्रस्तावित बिलने मेरे अतरमें इतनी हलचल मचा दी थी उसका ब्योरा पाठकों- को जान लेना ही चाहिए। उसका सार यह है : "दासवालमे रहनेका हक रखनेवाला हरएक भारतीय पुरुष, स्त्री और आठ वरस या इससे ऊपरका लड़का-लड़की एशियाई दफ्तरमे अपना नाम दर्ज कराके परवाना हासिल करे। यह परवाना लेते समय पुराना परवाना अधिकारी (रजिस्ट्रार) को सौप दे । नाम दर्ज करनेकी अर्जीमें नाम, ठिकाना, जाति, उम्र आदि लिख दें । रजिस्ट्रार प्रार्थीके शरीरपर जो खास निशान हों उन्हें नोट कर ले और उसकी दसो उगलियों और अंगूठेका निशान ले ले। जो भारतीय स्त्री-पुरुष नियत अवधिके अंदर ऐसी दर्खास्त न हे. उसका ट्रांसवालमें रहनेका हक रद हो जायगा। दर्खास्त न देना कानूनन अपराध माना जायगा। उसके लिए जेलकी सजा