भलमनसीका बदला - खूनो कानून १११ तरहका कानून है, इसका पता मुझे नही है । मैं जानता हूं कि नेटालके गिरमिटिया हिंदुस्तानियोंके लिए परवानेका कानून बहुत सख्त है पर वे बचारे तो स्वतंत्र लोग माने ही नहीं जा सकते । फिर भी कह सकते हैं कि उनके परवानेका कानून इस कानूनकी तुलनामे नरम है, और उस कानूनके तोड़- नेकी सजा तो इस कानूनमे निर्दिष्ट दण्डके सामने कुछ भी नही है । लाखोंका कारवार करनेवाला रोजगारी इस कानून- के अनुसार देश निकालेकी सजा पा सकता है, यानी इस कानूनका अग होनेसे उसके बिलकुल तबाह हो जानेकी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। धर्यवान् पाठक आगे चलकर देख सकेंगे कि इस अपराधकलिए लोगोंको देशनिकालेकी सजा भी मिल चुकी है। जरायम पेशा जातियों के लिए हिंदुस्तानमे कितना कड़ा कानून है । इस कानूनमे जो दसों उंगलियोंकी निशानी लेनेकी दफा थी वह तो दक्षिण अफ्रीकामे बिलकुल नई बात थी। इस विषयका कुछ साहित्य पढ़ जाना चाहिए, यह सोच- कर में मि० हेनरी नामक पुलिस अफसर की लिखी हुई 'उग- लियोकी निशानी' (फिगर इप्रेशन्स) पुस्तक पढ गया। उसमें मेने देखा कि इस प्रकार कानूनन उगलियोका निशान केवल अप- राधियोसे ही लिया जा सकता है । भत. जबर्दस्ती दसों उंगलियों- की छाप लेनेकी बात मुझे अति भयानक लगी। स्त्रियोको और वैसे हो १६ बरसके मदरके लड़के-लड़कियोंको भी परवाना लेना होगा, यह बात इस बिलमें पहले पहल रखी गई थी । अगले दिन कुछ गण्यमान्य हिदुस्तानियोको इकट्ठा कर मैने इस कानूनका अक्षर-अक्षर समझाया । फलतः उसका जो असर मुझपर हुआ था वही उनपर भी हुआ । उनमेंसे एक तो आवेशमे आकर वोल उठे -"कोई मेरी स्त्रीसे परवाना मांगने आया वो में उसको वही गोली मार दूंगा, पीछे मेरा जो होना हो वह होता रहे।" मैने उन्हे शांत किया और सबको
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