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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/१४२

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F सत्याग्रहका जन्म १३५ दुनिया तात्विक निर्णयोसे नही चलती । ईश्वरको साक्षी बनाकर की हुई प्रतिज्ञा और सामान्य निश्चयके बीच वह जमीन-आसमानका अत्तर मानती है । सामान्य निश्चयको बद- लनेमे निश्चय करने वाला शर्माता नहीं, पर प्रतिज्ञा करनेवाला अगर अपनी प्रतिज्ञाको तोड़ता है तो वह खुद तो शर्माता ही ह, समाजभी उसको धिक्कारता है और पापी समझता है। इन बातोकी जब इतनी गहरी हो गई है कि कानून भी कसम खाकर कही हुई बात झूठी ठहरे तो कसम खाने- थालेको अपराधी मानता है मोर सख्त सजा मिलती है । इन विचारोंसे भरा हुआ में जो प्रतिज्ञामोंका अनुभवी था और उनके मीठे फल चख चुका था, ऊपर लिखी प्रतिज्ञाकी बात सुनकर मयसे स्तब्ब हो गया। उसके परिणाम एक क्षण- में मेरे मानसचक्षुके सामने आ गये। इस घवराहटसे जोश पैदा हुआ और यद्यपि में इस सभामे प्रतिज्ञा करने या लोगोंसे कराने- का इरादा लेकर नही गया था फिर भी सेठ हाजी हवीवका सुझाव मुझे बहुत पसंद आया । पर इसके साथ-साथ मैने यह मी सोचा कि इस प्रतिज्ञा के सारे नतीजोंसे लोगोको वाकिफ करा देना चाहिए, प्रतिज्ञाका अर्थ स्पष्ट रूपसे समझा देना चाहिए । इसके बाद अगर वे प्रतिज्ञा कर सकें तो उसका स्वागत करना चाहिए और न कर सकें तो मुझे समझ लेना होगा कि अभी वे आखिरी कसोटीपर चढनेको तैयार नही हुए है। अतः मैने सभापतिसे प्रार्थना की कि मुझे सेठ हाजी हवीवके कथनका अर्थ समझानेकी इजाजत दे । मुझे इसकी इजाजत मिल गई। में उठा और जो कुछ कहा उसका खुलासा जैसा आज मुझे याद है वैसा नीचे दे रहा हूँ : "मैं सभाको यह बात समझा देना चाहता हूं कि आजतक जो प्रस्ताव हमने स्वीकार किये है और जिस रोतिये स्वीकार किये है उन प्रस्तावो और उस रीतिसे इस प्रस्ताव और इसकी