१३६ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह रीतिमे भारी अंतर है। यह प्रस्ताव अति गंभीर है, क्योकि इसपर पूरा-पूरा अमल होनेपर दक्षिण अफ्रीकामे हमारी हस्ती- का रहना-मिटना अवलंबित है। यह प्रस्ताव स्वीकार करने- की जो रीति हमारे भाईने सुभायी है वह जितनी गंभीर है उतनी ही नवीन है । में खुद इस रीतिसे निश्चय करानेका विचार करके यहां नहीं बाया था। इस यशके अधिकारी अकेले सेठ हाजी हबीब है और इसकी जवाबदेही भी उन्हीपर है । उन्हें में मुवारकवाद देता हूँ । इनका सुझाव मुझे बहुत रुचा है, पर आप उसे स्वीकार कर लेंगे तो आप भी उनकी जिम्मेदारी में साझी हो जाएगे। यह जिम्मेदारी क्या है, यह आपको समझ लेना चाहिए और कौमके सलाहकार और सेवकके रूपमे उसे पूरे तौरपर समझा देना मेरा फर्ज है । "हम सभी एक ही सिरजनहारको माननेवाले है। उसको मुसलमान भले ही ख़ुदा कहकर पुकारे, हिंदू भले ही उसको ईश्वरके नामसे भजे, पर है वह एक ही स्वरूप । उस- को साक्षी करके, उसको वीचमे रखकर हम कोई प्रतिज्ञा करे या कसम खाए, यह कोई ऐसी वैसी बात नही है। ऐसी कसम खाकर अगर हम उससे फिर जायं तो हम कोमके, दुनिया- कि के और खुदाके सामने गुनहगार होगे । में तो मानता हू सावधानी से, शुद्धबुद्धिसे मनुष्य कोई प्रतिज्ञा करे और पीछे उसको तोड़ दे तो वह अपनी इसानियत, अपनी मनुष्यताको खो बैठता है । और जैसे पारा चढ़ा हुआ तावेका सिक्का रुपया नही है - यह मालूम होते ही उसकी कोई कीमत नही रहती, इतना ही नही, बल्कि उस खोटे सिक्केका मालिक दण्डका पात्र हो जाता है- वैसे ही झूठी कसम खाने- बालेकी भी कोई कीमत नहीं होती, वल्कि लोक-परलोक दोनोंमें वह दण्डका अधिकारी होता है । सेठ हाजी हवीव ऐसी ही गभीर कसम खानेकी हमे सलाह दे रहे है। इस सभामे
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