१३८ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह तो यह कह सकते है कि अगर सब लोग अपनी कसमपर कायम रहें और भारतीय जनताका बड़ा भाग कसम खा सके तो यह कानून ( आडिनेस) या तो पास ही न होगा या पास होगा तो तुरत रद हो जायगा । कौमको अधिक कष्ट न सहना पड़ेगा। हो सकता है कि कुछ भी कष्ट न सहना पड़े । पर कसम खानेवालेका धर्म जैसे एक ओरसे श्रद्धापूर्वक आशा रखना है, वैसे ही दूसरी ओरसे नितात भाशा - रहित होकर कसम खानेको तैयार होना है। इसलिए में चाहता हू कि हमारी कडाईमे जो कड़वे से कड़वे परिणाम हमारे सामने आ सकते है, उनकी तसवीर इस सभाके सामने खीचदू । मान लीजिए कि यहा उपस्थित हम सब लोग शपथ ले लेते है । हमारी सख्या अधिक-से-अधिक ३ हजार होगी। यह भी हो सकता है कि बाकी १० हजार भारतीय कसम न खाय । शुरुमे तो हमारी हंसी होनी ही है। फिर इतनी सारी चेता- चनी दे देनेपर भी यह मुमकिन है कि कसम खाने वालोंमें कुछ या बहुत से पहली ही परीक्षामे कमजोर साबित हो जाय । हमे जेल जाना पड़े, जेलमे अपमान सहने पडे । भूख-प्यास, सरदी गरमी भी सहनी पडे | की मशक्कत करनी पडे । उद्धत दरोगाओं ( वार्डरी) के कोड़े खाने पड़े। जुर्माना हो और कुकमे हमारा माल - असवाव भी बिक जाय । लडनेवाले बहुत थोड़े रह गये तो आज हमारे पास बहुत पैसा होते हुए भी हम कल कंगाल हो जा सकते है । हमे देशनिकालेकी सजा भी मिल सकती है । जेलमे भूखे रहते और दूसरे कष्ट सहते हुए हममे से कुछ बीमार हो सकते हैं और कोई मर भी सकता है। अर्थात्, थोड़ेमें कहा जा सकता है कि यह बात तनिक भी नामुमकिन नही कि जितने कष्टोंकी कल्पना हम कर सकते है वे सभी हमें सहने पड़े और समझ- दारी इसी है कि ये सारे कष्ट सहन करने होंगे यह मानकर ही
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