सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/१४६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

1 सत्याग्रहका जन्म १३६ हम कसम खायं। मुझसे कोई पूछे कि इस लड़ाईका अंत क्या होगा और कब होगा तो मे कह सकता हूं कि अगर सारी कौम परीक्षामें पूरी तरह उत्तीर्ण हो गई तो लड़ाईका फैसला बहुत जल्दी हो जायगा । पर अगर हममेसे बहुतसे संकटका सामना होनेपर फिसल गये तो लड़ाई लवी होगी। पर इतना तो में हिम्मत के साथ और निश्चयपूर्वक कह सकता हू कि जबतक मुट्ठीभर लोग भी अपनी प्रतिज्ञापर दृढ़ रहनेवाले होंगे तबतक इस युद्धका एक ही अंत समझिये - अर्थात् इसमे हमारी जीत ही होगी । " अव दो शब्द अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी के बारेमें भी कह दू । यद्यपि में प्रतिज्ञा करनेकी जोखिमोंको बता रहा हूं, पर साथ ही आपको शपथ खानेकी प्रेरणा भी कर रहा हूं। इसमें मेरी अपनी जिम्मेदारी कितनी है, इसे में पूरे तौरपर समझता हूं। हो सकता है कि आवेशमे या गुस्सेमें आकर इस समामे उपस्थित लोगोंका बड़ा भाग प्रतिज्ञा करले, पर संकट -कालमे कमजोर साबित हो, और मुट्ठीभर लोग ही अंतका ताप सहन करनेके लिए रह जायं । फिर भी मुझ जैसे आदमीकेलिए तो एक ही रास्ता होगा- 'मर मिटना, पर इस कानून के आगे सिर न झुकाना में तो मानता हूं कि मान लीजिये ऐसा होनेकी तनिक भी संभावना नहीं, फिर भी फर्ज कर लीजिए कि सब गिर गये और में अकेला ही रह गया, तो भी मेरा विश्वास है कि प्रतिज्ञाका भंग मुझसे हो ही नहीं सकता। यह कहने का मतलब आप समझ लें यह घमंडकी बात नहीं, वल्कि खासतौर से इस मंचपर बैठे हुए नेताओंको सावधान करनेकी वात है। अपनी मिसाल लेकर में नेताओं से विनयपूर्वक कहना चाहता हूं कि अगर आपमें अकेला रह जानेपर भी दृढ़ रहनेका निश्चय या वैसा करनेकी शक्ति न हो तो आप इतना ही न करे कि खुद प्रतिज्ञा न करे, I