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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/१५९

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१५२ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह दुहराना पड़े तो इसमें हिचक होनी ही नही चाहिए । फिर भी किसे यह अनुभव नहीं हुआ है कि लोगोने जो प्रतिज्ञा सोच- समझकर की हो उसमें भी पीछे ढीले पड़ जाते है या मुहसे की हुई प्रतिज्ञाको लिखते हुए घबराते है ? पैसा भी हमारे अंदाजके अनुसार इकट्ठा हो गया। सबसे अधिक कठिनाई प्रतिनिधियोके चुनाव मे पड़ी। मेरा नाम तो था ही। पर मेरे साथ कौन जाय ? इस विचारमे कमेटीने बहुत वक्त गुजारा, कितनी ही रातें बीत गई और सभा-समितियोमे जो बुरी आदते देखनेमे आती है उनका अनुभव पूरे तौरपर हुआ। कोई कहता कि अकेले गाधी ही जाय, इससे सबका संतोप हो जायगा । पर मैंने ऐसा करनेसे साफ इन्कार कर दिया । मोटे हिसाबसे यह कह सकते है कि दक्षिण अफ्रीकामे हिंदू मुसलमानका सवाल नही था, पर यह दावा नही किया जा सकता कि दोनो कौमोके बीच जरा भी अंतर नही था । और इस भेदने कभी जहरीली शक्ल नही अख्तियार की तो इसका कारण वहाकी विचित्र परिस्थिति किसी हदतक भले ही हो, पर इसका असल और पक्का कारण तो यही है कि नेताओंने एकनिष्ठा और सच्चे दिलते अपना काम किया और कोमको सही रास्ता दिखाया । मेरी सलाह यह थी कि मेरे साथ एक मुसलमान सज्जनको तो होना ही चाहिए और दोसे अधिक आदमियोंकी जरूरत नही; पर हिंदुओोकी ओरसे तुरत. कहा गया कि आप तो सारी कौम प्रतिनिधि माने जाते है, इसलिए हिंदुओका भी एक प्रतिनिधि होना ही चाहिए । कुछ यह भी कहते कि एक प्रतिनिधि कोकणी मुसलमानोका, एक मेमनोका और हिंदुओमे एक किसानोका और एक अनाविल लोगोका होना चाहिए। इस प्रकार अनेक जातियोके दावे पेश हुए। अतमे सब समझ गये और हाजी वजीर अली और में यही दो आदमी एकमतसे चुने गये ।