१५४ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह उमराव (लार्ड) वर्गके किसी बड़े नेताको इस काम के लिए दूढ़ दिया होता। हम सर लेपल ग्रिफिनसे मिले । उनकी राजनीति तो हिंदुस्तानमें चलते हुए सार्वजनिक आन्दोलनोको विरोधी ही थी; पर इस मसलेसे उनको गहरी दिलचस्पी हो गई और सौजन्यकेलिए नहीं, बल्कि न्यायको दृष्टिसे उन्होने हमारा अगुआ बनना मंजूर कर लिया। उन्होने सारे कागज पत्र पढ़ डाले और हमारे मसलेसे पूरी जानकारी कर ली। हम दूसरे एंग्लो इंडियन सज्जनोसे भी मिले। आम समाके बहुतसे सदस्यो- से और जिनका कुछ भी प्रभाव था ऐसे जितने आदमियों तक हमारी पहुंच हो सकती थी उन सबसे मिले । लाई एल्गिन के पास शिष्ट-मण्डल गया। उन्होने सारी बातें ध्यानपूर्वक सुनली। अपनी हमदर्दी जाहिर की और साथ-ही-साथ अपनी कठिनाइयां भी बताई। फिर भी जितना हो सके उतना करनेका वचन दिया। यही शिष्ट-मडल लार्ड मॉलसे भी मिला। उन्होने भी सहानुभूति प्रकट की। उनके उत्तरका सार पीछे दे चुका हू । सर विलियम वेडरबर्न की कोशिशसे आम सभा के हिंदुस्तान के राज-काजसे लगाव रखनेवाले सदस्योकी सभा उसी भवनके एक दीवानखाने में हुई और हमने उसके सामने भी अपना पक्ष जितना हमसे हो सका रखा । इस वक्त आइरिश पक्षके नेता मि० रेडमड थे । इसलिए हम उनसे भी खास तोरसे मिलने गये । खुलासा यह कि आम समाके सब पक्षोके जिन-जिन सदस्योसे हम मिल सकते थे उन सबसे मिले । इंगलेडने हमें कांग्रेसकी ब्रिटिश कमेटीकी भरपूर मदद तो थी ही। पर यहाके रीति-रिवाजके मुताबिक उसमें तो पक्ष- विशेष और मतविशेषके आदमी ही आ सकते थे। ऐसे बहुतेरे थे जो उक्त कमेटीमें तो नही आते थे; पर हमारे काम में पूरी मदद देते थे। हमने सोचा कि इन सबको
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