RE दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह न आने दिया जाय और सत्याग्रहको छोड़कर और आन्दो- लनोंमें उनके साथ-साथ काम किया जाय । इन विचारोसे अंतमे सारी कोमने यही निश्चय किया कि सत्याग्रहकी कढ़ाई किसी वर्तमान सस्थाके जरिये न चलाई जाय दूसरी संस्थाएं जितनी सहायता दे सकती हो दें और सत्याग्रहको छोडकर और जो उपाय खूनी कानून के विरोधमे कर सकती हों करे। अतः 'पैसिव रेजिस्टेंस एसो- सियेशन' अथवा 'सत्याग्रह-मंडल नामकी नई संस्था सत्या- ग्रहियोने स्थापित की । अंग्रेजी नामसे पाठक यह समझ लेंगे कि जिस वक्त इस नये मंडलको स्थापना हुई उस वक्त तक सत्याग्रह नामकी खोज नहीं हो सकी थी। ज्यो-ज्यो समय बीतता गया त्यों-त्यों हमें यह मालूम होता गया कि अलग संस्था स्थापित करनेसे जनताका हर तरह लाभ ही हुआ और अगर वैसा न हुआ होता तो सत्याग्रहके आन्दोलनकी शायद हानि हो हुई होती। बहुत से लोग इस नई संस्थाके सदस्य हुए और जनताने पैसा भी खुले हाथो दिया । मेरे अनुभवने मुझे यह बताया है कि कोई भी धान्दोलन पैसेकी कमीसे टूटता, अटकता या निस्तेज नही होता । इसके मानी यह नहीं है कि कोई भी लौकिक आन्दोलन विना पैसेके चल सकता है । पर इसका यह अर्थ अवश्य है कि जहा सच्चे संचालक है वहा पैसा अपने आप चला आता है । इसके विपरीत मुझे यह भी अनुभव हुआ है कि जिस आन्दोलनको पैसेका अतिरेक हो जाता है उसकी उसी समय से अवनति बारभ हो जाती है। इससे कोई सार्वजनिक सस्था पूजी इकट्ठी करके उसके व्याजसे अपना कारवार चलाये इसे पाप कहने की हिम्मत तो नही होती, इससे इतना ही कहता कि यह अयोग्य है। सार्वजनिक संस्थाकी पूजी तो जन- समुदाय ही है। जबतक वह चाहता है तभी तक उसे जीवित
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