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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/१७५

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१६८ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह प्रिटोरियाको मस्जिदके मैदान मे हुई । सत्याग्रह आरभ होनेके वादसे लोग सभाओमें इतनी बडी तादादमे आने लगे थे कि किसी मकान सभा करना नामुमकिन हो गया था । सारे ट्रासचालमें हिंदुस्तानियो की आबादी १३ हजारसे अधिक नही मानी जाती थी, जिसमेसे १० हजारसे कुछ ऊपर जोहा- न्सवर्ग और प्रिटोरियामें ही वसते थे। इस तादादमेसे पाच- छः हजार लोग सभामें उपस्थित हो, यह संख्या दुनियाके किसी भी भागमे बहुत बड़ी और अति सतोषजनक मानी जा सकती है। सार्वजनिक सत्याग्रहकी लडाई और किसी शर्तपर लडी भी नही जा सकती । जहा युद्धका आधार केवल अपना वल हो वहा उस विषयको सार्वजनिक शिक्षा नहीं दी गई हो तो लढाई चल ही नही सकती। इससे यह उपस्थिति हम कार्यकर्ताओके लिए कोई अचंभेकी चीज नही थी। हमने शुरूसे ही निश्चय कर लिया था कि अपने आम जलसे खुले मैदानमे ही करेंगे । इससे हमारा खर्च कुछ नहीं होता था और जगहकी तगीके कारण एक भी आदमीको वापस नही जाना पडता था । यही यह बात भी लिख देना चाहिए कि ये सारी सभाएं अधिकाशमें बहुत शांत होती । आनेवाले सारी बातोंको बड़े ध्यानसे सुनते ! कोई बहुत दूरपर खड़ा होनेके कारण सुन न सकता तो वक्तासे ऊंची आवाजमे बोलने का अनुरोध करता । पाठकोंको यह बताने की जरूरत नही होनी चाहिए कि इन सभाओमे कुसियो वगैरहका इंतजाम विलकुल ही न होता । मच इतना ही वडा बनाया जाता कि केवल सभापति, वक्ता और सभापतिके अगल-बगल दो-चार आदमी और बैठ के उसके ऊपर एक छोटीसी मेज और दो-चार कुसिया तिपाडया रख दी जाती । I प्रिटोरियाकी इस सभा के सभापति ब्रिटिश इडियन एसोसियेशन के कार्यकारी अध्यक्ष युसुफ इस्माईल मिया थे । खूनी कानूनके अनुसार परवाने निकालनेका वक्त