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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/१८४

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पहला सत्याग्रही कंदी १७७ खबर मिली कि अमुक रातको अमुक दुकानमे फलां-फला आदमी परवाना लेनेवाले हैं। इससे कोमने पहले तो यह इरादा रखनेवालोंको समझानेका यत्न किया, फिर उस दूकानपर पहरा भी बैठवा दिया। पर मनुष्य अपनी कमजोरी- को कवतक दवा सकता है ? रातके दस - ग्यारह बजे कुछ मुखियोने इस तरह परवाने लिये और एक सुरमे बजने वाली वासरीमे विसंवादी स्वर वज उठा । दूसरे ही दिन इनके नाम भी कौमने प्रकाशित कर दिये । पर शर्मको भी एक हव होती है। स्वायं जब सामने आकर खड़ा होता है तब लाज-संकोच काम नही देता और मनुष्य सत्पथसे भ्रष्ट हो ही जाता है। इस पहली फटके फलस्वरूप धीरे-धीरे कोई पाच सौ आदमियोने परवाने ले लिये। कुछ दिनोंतक परवाने देनेका काम निजी मकानोमे ही होता रहा, पर ज्यो- ज्यो लाजका बल घटता गया त्यों-त्यो इन पाच सौ आदमियोंमे कितने ही खुले आम भी अपने नाम दर्ज करानेके लिए एशिया- टिक दफ्तरमे जाने लगे ।

१८ :

पहला सत्याग्रही कैदी अथक प्रयत्न करनेपर भी जब एशियाटिक दफ्तरको ५०० से अधिक आदमी नाम दर्ज करानेवाले नही मिल सके तब उस महकमे के अफसरोने निश्चय किया कि नव हमे किसी-न-किसीको गिरफ्तार करना चाहिए । पाठक जस्टिन नगरका नाम जानते है । वहा बहुतसे हिंदुस्तानी वसते थे। उनमे पडित रामसुंदर नामका एक आदमी था । वह देखनेमें वहादुर आदमी-सा लगता था और वाचाल था । १२