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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/१८८

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'इंडियन ओपीनियन १८१ पाठक रामसुदरके दोष न देखे ! इस जगत्मे मनुष्य- मात्र अपूर्ण है । किसीकी अपूर्णता अधिक देखनेमे आती है। है तो हम उसकी ओर उगली उठाते है । वस्तुतः यह मूल है । रामसुदर कुछ जान-बूझकर निवेल नही बना । मनुष्य अपने स्वभावकी दशा बदल सकता है, उसपर अंकुश रख सकता है; पर उसे जडमूलसे कौन मेट सकता है ? जगत्- कर्ताने इतनी स्वतंत्रता उसको दो ही नही । बाघ अपनी खालकी विचित्रताको वदल सकता है तो मनुष्य भी अपने स्वभावको विचित्रता बदल सकता है। भाग जानेपर भी रामसूदरको अपनी कमजोरीपर कितना पश्चाताप हुआ होगा, यह हम कैसे जान सकते है ? अथवा उसका भाग जाना ही क्या उसके पश्चातापका एक सबल प्रमाण नहीं माना जा सकता ? वह बेशर्म होता तो उसे भागनेकी क्या जरूरत थी ? परवाना निकलवाकर खूनी कानूनके अनुसार वह सदा जेल मुक्त रह सकता था। यहीं नहीं, वह चाहता तो एशियाटिक दफ्तरका दलाल बनकर दूसरोंको बहका सकता था और सरकारका प्रिय भी बन सकता था । हम यह उदार अयं क्यों न करे कि यह करनेके बदले अपनी कमजोरी कोमको दिखानेमे उसको शर्म लगी और उसने मुह छिपा लिया, और यह करके भी उसने कौमकी सेवा ही की ?

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'इंडियन श्रोपीनियन' सत्याग्रहकी लड़ाईमे बाहरके और भीतरके जितने भी साधन अपने पास थे उन सबको मुझे पाठकोके सामने रखना है। इसलिए 'इंडियन ओपीनियन नामका जो साप्ताहिक पत्र